72 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘किसी भी प्रांत को अलग विधान बनाने, अलग वित्तीय साधन जुटाने अथवा सरकारी सेवाओं में नियुक्तियां करने अथवा पदों का सृजन करने या किसी तरह का परिवर्तन करने का अधिकार नहीं था और उसके साथ पत्र-व्यवहार करने से संबंधित अंतिम प्रतिबंध से उस सरकार को प्रांतीय प्रशासन के सभी मामलों में दखल देने का अधिकार मिल गया।’’ ख्1,
सैनिक, राजनैतिक, वैधानिक अथवा प्रशासनिक दृष्टि से साम्राज्यिक (इम्पीरियल) शासन व्यवस्था की जो भी विशेषताएं रहीं, यह कटु वास्तविकता है कि वित्तीय व्यवस्था के रूप में इस पर पड़ने वाले दबावों के कारण यह विषम रही। आरंभ से ही यह वित्तीय त्रुटियों का शिकार रही और ऐसा बहुत कम हुआ जबकि वित्त मंत्रियों द्वारा संतुलन पुनः स्थापित करने और संकट की घड़ी को टालने के प्रयास सफल रहे। घाटे की गंभीरता निम्न आंकड़ों से परखी जा सकती हैःµ
साम्राज्यवादी (केन्द्रीय) वित्त व्यवस्था की कमी
वर्ष बचत घाटा वर्ष बचत घाटा
पौंड पौंड पौंड पौंड 1834-35 - 194,477 1846-47 - 971,322
35-36 1,441,513 - 47-48 - 1,911,986
36-37 1,248,224 - 48-49 - 1,473,225
37-38 780,318 - 49-50 354,187 -
38-39 - 381,789 50-51 415,443 -
39-40 - 2,138,713 51-52 531,265 -
40-41 - 1,754,852 52-53 424,257 -
41-42 - 1,771,603 53-54 - 2,044,117
42-43 - 1,346,011 54-55 - 1,707,364
43-44 - 1,440,259 55-56 - 972,791
44-45 - 743,893 56-57 - 143,597 1845-46 - 1,496,865 57-58 - 7,864,222
इस घाटे द्वारा दर्शायी गई भारतीय वित्त व्यवस्था की शोचनीय दशा पर जो कोई भी विचार करेगा वह हाउस ऑफ कामन्स में डिजरायली द्वारा व्यक्त इस आश्चर्य से सहमत हुए बिना नहीं रहेगा किµ
ब्रिटिश इंडिया में विकेन्द्रीकरण पर रायल कमीशन की रिपोर्ट, पृ. 24
श्री विल्सन द्वारा वर्ष 1860-61 के लिए ब्रिटिश भारत के वित्त वक्तव्य से उद्धृत, हाउस ऑफ कामन्स
रिटर्न, 33, 1860, का पृष्ठ 100