साम्राज्यवादी व्यवस्थाः इसका विकास और ”ास 73
‘‘भारत का प्रशासन भले ही हमेशा सक्षम व योग्य रहा है, इस प्रशासन द्वारा पैदा किए गए व्यक्ति कितने विशिष्ट रहे हैं, महान नायकों, चतुर कूटनीतिज्ञों की कितनी ही भरमार रही है और सरकार के बड़े-बड़े जिलों के भले ही बहुत कुशल प्रशासक हैं किन्तु भारत की वित्तीय स्थिति सदैव शोचनीय रही है और भारत जिसने इतनी अधिक महान हस्तियां पैदा की हैं, राजकोष का मंत्री (चांसलर) पैदा करने में असमर्थ दिखाई देता है।’’ ख्1,
हालांकि इस पतन के कारण खोज निकालना मुश्किल नहीं है। भारतीय वित्त व्यवस्था की खामियां दोषपूर्ण वित्त नीति में ढूंढी जा सकती हैं। यह नीति कई कारणों से दोषपूर्ण थी। राज्यों द्वारा व्यय की गई धनराशि के संदर्भ में अक्सर तर्क दिया जाता है कि संभावित व्यय का निर्धारण राजस्व की प्राप्ति के अनुसार ही किया जाना चाहिए किन्तु अनुभव दर्शाता है कि जहां कहीं भी इस सिद्धांत की सीमाओं को पूरा महत्व नहीं दिया गया वहीं इसके परिणाम विनाशकारी रहे हैं। इस बात पर बार-बार जोर नहीं दिया जा सकता कि देश का बढ़ता खर्चा समाज की बढ़ती पूंजी से ही पूरा किया जा सकता है। न ही जोरदार ढंग से इस बात पर जोर दिया जा सकता है कि ठोस वित्तीय व्यवस्था का आधार आवश्यक राजस्व एकत्रित करने की क्षमता में ही निहित है। यह बात याद रखनी चाहिए कि राजस्व प्राप्त करने का तरीका समस्या का वह पहलू है जो देश की उत्पादकता एवं स्थायित्व के लिए भयानक परिणामों से भरा पड़ा है। स्पष्टतः यह नकारा नहीं जा सकता कि कराधान के असमान तरीकों से उसी तरह सामाजिक उथल-पुथल पैदा हो सकती है जिस तरह व्यापार और उद्योग पर इसको दोषमुक्त प्रभाव के कारण यह अपनी आर्थिक कार्यशैली और तकनीक को गतिहीन बनाकर तथा समाज की उत्पादक क्षमताओं को नष्ट करके राज्य को भिखारी बनाकर समाज को कंगाल बना सकता है। अतः बुद्धिमत्ता का तकाजा है कि जिन पर देश के वित्तीय-प्रबंधन का भार है उन्हें पूंजी निर्माण और व्यय करने के तात्कालिक उद्देश्य से आगे की सोचनी चाहिए, क्योंकि वित्त के मामले में ‘‘कैसे’’ शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है और व्यवहार में इसे एकदम नहीं भुला सकते। सामाजिक संपदा ही वह पैतृक संपत्ति है जिस पर देश भरोसा कर सकता है और जो देश इसे नष्ट कर देता है वह स्वयं नष्ट हो जाता है। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहां इस आधारभूत सत्य की मूर्खतापूर्ण उपेक्षा करने वाले देश तहस-नहस हो गए हैं लेकिन साक्ष्य के तौर पर यदि एक अन्य उदाहरण की आवश्यकता हो तो इसकी पूर्ति भारत में स्थापित साम्राज्यिक (इम्पीरियल) वित्त व्यवस्था कर सकती है।
- सर चार्ल्स बुड्स का प्रशासन, पृ. 65-66 से वैस्ट द्वारा उद्धृत।