74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भूमि कर प्रचलित साम्राज्यिक राजस्व व्यवस्था के तहत अत्यंत कठोर कराधान था। भारत में कर लगाने के सिद्धांत के पीछे यह तर्क था कि खेतिहरों द्वारा राज्य को दिया जाने वाला कर भूमि का किराया है, क्योंकि भारत में पुराने समय से भूमि को राज्य की संपत्ति माना गया है। खेती करने वाला भूमि का स्वामी नहीं बल्कि किरायेदार है। भूमि उसे किराए पर दी गई है अतः भूमि से कर के रूप में हासिल होने वाले समस्त धन पर राज्य का अधिकार न्यायसंगत है। इस अवधारणा के आधार पर भूमि कर (लगान) लगाया जाता रहा चाहे उसकी आवश्यकता रही हो या नहीं।
राज्य को वैध रूप से भू-स्वामी मानने के अतिरिक्त एक अन्य आर्थिक सिद्धांत भी था जिसके द्वारा भूमि कर में वृद्धि करना न्यायसंगत ठहराया जाने लगा।
इस बात को मानने के पीछे तर्क यह है कि भारत में निबल उत्पाद (प्रोड्यूट नेट) के भू-अर्थशास्त्रीय सिद्धांत (फिजियोक्रेटिक डॉक्ट्राइन) का प्रभाव भूमि पर निश्चित करने और प्रबंधन पर पड़ा। हम पाते हैं कि राजस्व प्रबंधन के आरंभिक चरणों में भारतीय उच्च अधिकारी यह तर्क देते रहे हैं कि ‘‘भले ही फ्रांसीसी अर्थशास्त्रियों का भूमि पर लगने वाले सभी करों का सिद्धांत ख्...., गलत या सही रहा हो, भारत में लागू व्यवस्था के लिए यह सुविधाजनक था, यह सिद्धांत केवल फ्रांसीसियों द्वारा ही समर्पित नहीं था बल्कि इंग्लैंड के सम्माननीय शासकों द्वारा भी इस सिद्धांत को समर्थन प्राप्त था क्योंकि उनका मानना था कि अंतिम रूप से सभी कर भूमि के उत्पादों पर ही लगते हैं, और इससे इतर सिद्धांत प्रतिपादित करने में ‘‘वैल्थ ऑफ नेशन्स’’ के प्रबुद्ध लेखक पूर्व आंकड़ों के निष्कर्ष के आधार पर स्वयं को विपरीत स्थिति में पाते हैं। ख्1,
भूमि कर बढ़ाने के जो भी कारण रहे हों, कुछ लोग ही इस बात को नकार सकते हैं कि अपने पूरे या तकरीबन पूरे लाभ को स्वयं खपत करने वाली किसी भी वर्ग की औद्योगिक इकाई के पहले उत्पाद पर ऊंची संगठित चुंगी लगाना विनाशकारी तथा अशिष्ट है। ऐसा करना उस उत्पाद की उत्पत्ति पर प्रभावी रोक लगा देता है जिसके भावी उत्पादन को लाभकारी ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है और जिसके माध्यम से व्यक्तिगत पूंजी तथा सरकारी राजस्व को कल्पनातीत सीमा तक बढ़ाया जा सकता है। इस तरह का भूमिकर उस पूंजी के उत्पादन को अवश्य नष्ट कर देगा जिसका निर्माण औद्योगिक इकाइयों ने किया। भूमि पर लगाया जाने वाला कर इतना अधिक था कि भारत में चालू कर व्यवस्था को एकल कर प्रणाली ख्1, का नाम दिया जा सकता है।
- इस महत्त्वपूर्ण विवाद जिस पर बेडन पावेल का ध्यान नहीं गया के लिए देखें हाउस ऑफ कामन्स का
लेख 306, 1812-13