1 साम्राज्यवादी व्यवस्था : इसका विकास और ह्रास - Page 90

साम्राज्यवादी व्यवस्थाः इसका विकास और ”ास 75

जहां भूमिकर के कारण कृषि उद्योग की समृद्धि रुक गई वहीं सीमा शुल्क ने देश के उत्पादकों को नुकसान पहुंचाया। देश में आंतरिक और बाह्य सीमा-शुल्कों का प्रावधान था और दोनों तरह के सीमा-शुल्क व्यापार और उद्योग के लिए समान रूप से नुकसानदेह थे। आंतरिक सीमा-शुल्क में आवागमन तथा नगर शुल्क शामिल थे। ख्1, आवागमन शुल्क के उद्देश्य के लिए देश को कृत्रिम रूप से अनेक छोटे सीमा-शुल्क क्षेत्रों में विभाजित कर दिया था। प्रत्येक सीमा-शुल्क क्षेत्र के भीतर वस्तुओं का निर्माण और उनका इच्छानुसार उपभोग किया जा सकता था, लेकिन जैसे ही ये वस्तुएं अपने सीमा-शुल्क क्षेत्र से बाहर निकलती थीं उन पर शुल्क लगा दिया जाता था। हालांकि इस शुल्क के विनाशकारी प्रभाव छिपे हुए थे, फिर भी वे वास्तविक थे। आवागमन शुल्क से व्यापार में बाधाएं पहुंचने लगीं और अंततः देश के उत्पादकों को नुकसान पहुंचने लगा। एडम स्मिथ हमें बता चुके हैं कि उद्योग का विकास किस तरह बाजार व्यवस्था पर निर्भर करता है। आवागमन शुल्क वसूलने के उद्देश्य से पूरे देश को चेस बोर्ड की भांति छोटे-छोटे भागों में विभाजित कर दिया गया था। आश्चर्य की बात

  1. भारत के कुल राजस्व और भूमि राजस्व का अनुपात निम्न थाµ
o"kZ vuqikr o"kZ vuqikr o"kZ vuqikr
1792&3
  ls
1796&7
1797&8
1801&2
1802&3
  ls
1806&7
1807&8
  ls
1811&12
1812&13
  ls

1816&17
50-33



42-02

31-99
31-68


52-33



1817&18
ls
1821&22
1822&23
ls
1826&27
1827&28
ls
1831&32
1832&33
ls
1836&37
1837&38
1841&42
66-17


61-83


60-90


57-00

59-05
1842&43
ls
1846&47
1847&48
ls
1851&52
1852&53
ls
1855&56
64 o"kZ
dk vkSlr
55-85
56-06
55-40
54-07
  1. इस व्यवस्था का निकट से अध्ययन करने वाले श्री ट्रेवेलियान इसके विनाशकारी प्रभावों से इतना अधिक

घबरा गये थे कि उन्होंने यह लिख डाला, ‘‘हालांकि हमारे पास इसके अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रदर्शन है

फिर भी जब यह एक बार समापत कर दिया जाएगा तो दुनिया मुश्किल से विश्वास कर पाएगी कि

पूरी एक सदी के खास हिस्से तक हम इस व्यवस्था को बर्दाश्त करते रहे।’’ बंगाल प्रांत में आवागमन

और शहर शुल्क की व्यवस्था, पृ. 6