76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नहीं है कि ऐसे में व्यापार और उसके सहयोगी उद्योग को अत्यंत दयनीय स्थिति में रहना पड़ा। आवागमन शुल्क का बुरा प्रभाव दूसरी तरह से भी महसूस किया गया। औद्योगिक रूप से विकसित प्रत्येक देश में न केवल श्रम का सामाजिक विभाजन होता है बल्कि श्रम का सीमा क्षेत्रीय विभाजन भी होता है जिसे दूसरे शब्दों में उद्योग का स्थानीयकरण कहते हैं। इस बात के अनेक उदाहरण मौजूद हैं कि औद्योगिक स्थानीयकरण भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रमुख विशेषता थी। ख्1, इसके तहत भारत में प्रत्येक क्षेत्र को एक विशेष कला अथवा उद्योग में विशेषता हासिल हो गई, उदाहरण के लिए कपास एक क्षेत्र में पैदा किया जाता था, इसे बुना दूसरे क्षेत्र में जाता था और इसकी रंगाई का काम तीसरे क्षेत्र में होता था। लेकिन अक्सर ऐसा होता था कि ये क्षेत्र अलग-अलग सीमा-शुल्क क्षेत्रों में स्थित होते थे और कच्चे माल को अंतिम चरण में पहुंचने तक उस पर कई बार आवागमन शुल्क देना पड़ जाता था। इससे राहत पाने के लिए प्रत्येक क्षेत्र को अलाभकारी कार्यों में अपनी ऊर्जा गंवानी पड़ती थी ताकि आवागमन शुल्क देने से बचा जा सके।
नगर शुल्क से जो आंतरिक सीमा-शुल्क का एक भाग माना जाता था, के प्रभाव से शहरीकरण पर विपरीत प्रभाव पड़ा। निस्संदेह व्यावसायिक केन्द्र किसी देश के व्यापार के प्रमुख अवयव होते हैं। ये किसी भी मात्रा में हर प्रकार की वस्तुओं की खरीद-फरोख्त, जमा-पूंजी, ऋण सुविधाओं तथा सामान्य सूचनाओं के केन्द्र का काम करते हैं। ये व्यावसायिक केन्द्र देश के व्यवसाय तथा उद्योग-धंधों को सहयोग तथा उत्साह प्रदान करते हैं। लेकिन नगर शुल्क ने सीधे-सीधे व्यवसाय को प्रभावित किया, क्योंकि व्यवस्था के तहत आने वाली प्रत्येक वस्तु पर आवागमन शुल्क का भुगतान करने के पश्चात् नगर में प्रवेश करने पर नगर शुल्क का भुगतान करना पड़ता था और यदि नगर में प्रवेश करने पर निर्माता द्वारा वस्तु को किसी प्रकार बदलना पड़ जाता था तो आवागमन शुल्क के तहत दूसरी बार शुल्क का भुगतान किए बिना उस वस्तु को किसी दूसरे पड़ोसी स्थान पर नहीं ले जाया जा सकता। भ्रम और कौशल के परिणामस्वरूप वस्तु के मूल्य में हुई वृद्धि के अनुपात में ही दूसरी बार बढ़ाकर शुल्क लगाया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ कि शहरों में व्यापार और उद्योग घटने लगे, क्योंकि व्यापारियों ने वस्तुओं को एक शहर से दूसरे शहर में ले जाना बंद कर दिया, क्योंकि आवागमन शुल्क की परिधि में आने वाली वस्तुओं के किसी भी निर्माता के लिए अपनी जरूरत से अधिक माल उत्पादित करना संभव नहीं रहा।
इस परिस्थिति में भारतीय उद्योग को विदेशी उद्योगपतियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए कहा गया। लेकिन बाह्य सीमा-शुल्क उन्हें बढ़ावा देने की बात तो दूर रही,
- देखिए एम. मार्टिन की पुस्तक ‘‘ईस्टर्न इंडिया’’ के तीन भाग।