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सही सुरक्षा भी प्रदान नहीं कर सका। नियमानुसार व्यापारिक शुल्क वस्तुगत प्रतिस्पर्धा पर आधारित होता है। आयात शुल्क ऊंची दरों के माध्यम से उन विदेशी वस्तुओं के आयात को नियंत्रित करने के लिए होता है जो समान वस्तुओं के देश में सफल उत्पादन प्रक्रिया में अवरोध पैदा कर सकती है और निर्यात-शुल्क वह कहलाता है जो उन स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने के लिए लगाया जाता है जो विदेशी बाजार में घुसपैठ करने की कोशिश कर रही हों। लेकिन भारत में बाह्य सीमा-शुल्क के सिद्धांत का वस्तुगत प्रतिस्पर्धा के सिद्धांत से कोई संबंध नहीं था। अपनाई गई वास्तविक नीति के साथ तुलना करने पर पता चलता है कि संरक्षक तक उद्योग को पूरी तरह स्वतंत्र छोड़ना चाहता था क्योंकि यह शुल्क नहीं बल्कि राजनीतिक कारणों पर आधारित था। भारतीय आयात शुल्क आयात की जाने वाली वस्तुओं के स्वरूप के साथ नहीं बदलता था बल्कि आयात के देश तथा उस स्थान जहां से जहाज लादा गया है। यह सब राजनीतिक आधार पर ही किया जाता था। अत्यंत खेद का विषय है कि इस प्रकार की प्राथमिकता से लोगों तथा सरकार दोनों को बहुत हानि हुई। यह बात माननी होगी कि इंग्लैंड में बनी वस्तुओं को भारत में लाने और भारत में निर्मित वस्तुओं को इंग्लैंड निर्यात करने पर अन्य देशों में निर्यात पर लगने वाले शुल्क से आधा शुल्क लगता था, लेकिन आंतरिक सीमा-शुल्क के तहत भारतीय वस्तुओं पर लगाए गए शुल्क ही तुलना में ब्रिटिश वस्तुओं पर बहुत कम सीमा-शुल्क भुगतान की अनुमति देकर भारतीय उद्योग-धंधों को बलि की वेदी पर चढ़ा दिया गया। ध्यान देने योग्य है कि यह उस समय किया गया जब ब्रिटेन ऊंची शुल्क दरों के माध्यम से भारत में निर्मित वस्तुओं और जहाजों के इंग्लैंड में प्रवेश पर रोक लगा रहा था। लेकिन जबकि आयात शुल्क के कारण विदेशी भारतीय उत्पादों जिन पर आंतरिक सीमा-शुल्क का बहुत अधिक भार पड़ा हुआ था के साथ अपनी प्रतिस्पर्धा जमा रहे थे, वही भारी निर्यात शुल्क के कारण भारतीय उत्पाद विदेशी मंडियों में अपनी प्रतिस्पर्धा नहीं जमा सके। यह निर्यात शुल्क व्यवस्था की सबसे अधिक सोचनीय विशेषता थी। भारतीय शुल्क व्यवस्था उन्नसीवीं ख्1, सदी में काफी लंबे समय तक लागू रही।

इस प्रकार आंतरिक तथा बाह्य सीमा-शुल्क कानून व्यापार के रास्ते में रोड़ा अटकाते रहे और उद्योग का गला घोंटते रहे। सीमा-शुल्क के प्रांत बहुत कम राजस्व

  1. उपरोक्त प्रत्येक वक्तव्य का संदर्भ बताना मुश्किल है। भारत की शुल्क व्यवस्था का इतिहास अभी तक

अलिखित है लेकिन इस विषय पर अनेक साक्ष्य 1821 की व्यापार संबंधी संसदीय समिति और 1813

तथा 1853 में ईस्ट इंडिया कंपनी के मामलों के लिए गठित समितियों को दिए गए साक्ष्यों में पाए जा

सकते हैं। 1846 में ‘‘ईस्ट इंडिया प्रोड्यूस’’ पर गठित कंपनी के साक्ष्य और रिपोर्ट की ओर विशेष

ध्यान आकर्षित किया जाता है।