रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन
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अधिक वृद्धि कर दी? ऐसे एक मामले में नियंत्रक प्रभाव क्या था जो दूसरे मामले में अनुपस्थित रहा? जिन लोगों की यह धारणा थी कि चांदी का विमुद्रीकरण ही एक ऐसा कारण था जो उसके अवमूल्यन के लिए उत्तरदायी था। उनका तर्क था प्रत्येक दशा में समान होते हुए भी दोनों अवधियों में एक महत्वपूर्ण बात पर अंतर था। उन दोनों में इस तथ्य के आधार पर भिन्नता थी कि पूर्व स्थिति में यह आम प्रथा थी कि देश की मानक मुद्रा की परिभाषा सोने की एक निश्चित मात्रा अथवा चांदी की एक निश्चित मात्रा द्वारा की जाती थी। 1803 से पूर्व दोनों धातुओं को अलग-अलग देशों में अलग-अलग ढंग से आंका जाता था ख्1, परंतु उस समय से 1ः15 ½ की दर अधिक समान हो गई जिसका परिणाम यह हुआ कि इस अवधि में मुद्रा संबंधी मानक या तो सोने का एक ग्रेन अथवा चांदी का 15 ½ ग्रेन रहा।
दूसरी ओर, दूसरी अवधि के दौरान उस ‘‘अथवा’’ चांदी के विमुद्रीकरण और स्थगन आदेशों द्वारा समाप्त किए गए प्रथम अंतराल की विशेषता थी। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि प्रथम अवधि को द्विधातुवाद के परिचालन से लक्षित किया गया जिसके अंतर्गत दोनों धातुओं को किसी निश्चित अनुपात पर अंततः परिवर्तनीय रूप से उपयोग किया जा सकता था। दूसरी अवधि में उनका इस प्रकार उपयोग नहीं हो सका जिसका कारण यह तथ्य है कि अंतः परिवर्तन के लिए निश्चित अनुपात रद्द कर दिया गया। अब निश्चित अनुपात के अस्तित्व अथवा अस्तित्वहीनता के बारे में ऐसा सशक्त प्रभाव कहा जा सकता है कि क्या इससे कुल अंतर का पता लग सकता है जिसने इन दो अवधियों को इतने विशेष अंतर से लक्षित किया है? यही वह कारण था जिसने कुल अंतर को लक्षित किया और यह मत द्विधातुविदों का रहा। यह कहा गया कि प्रथम अवधि में जो मुद्रा पद्धति प्रचलित थी, उसके कारण उस अवधि में सोना और चांदी स्थानापन्न बन गए तथा वे ‘‘दो अलग-अलग शक्तियों की एक वस्तु’’ माने गए। इस प्रकार वर्णित आपूर्ति की शर्तों का उनके विनिमय के अनुपात पर कोई प्रभाव नहीं हुआ जो किसी स्थानापन्न के बिना किसी वस्तु के संबंध में ऐसी स्थिति में होता। ऐसी उन वस्तुओं के बारे में, जो स्थानापन्न हों, एक का तुलनात्मक अभाव दूसरे की शर्तों के संबंध में अपेक्षाकृत अधिक मूल्य नहीं दे सकता, जैसा कि उनके विनिमय के अनुपात में परिभाषित है क्योंकि स्थानापन्न की स्वतंत्रता के कारण दूसरी वस्तु की प्रचुरता से अभाव की पूर्ति की जा सकती है। दूसरी ओर एक वस्तु की तुलनात्मक प्रचुरता विनिमय के अनुपात से कम दूसरी वस्तु के मूल्य का अपकर्ष नहीं कर सकती क्योंकि उसकी अधिकता दूसरी वस्तु के अभाव के फलस्वरूप निर्मित रिक्तता को अवशोषित कर सकती है। जब तक वे प्रतिस्थापन के नियत अनुपात के साथ स्थानापन्न बने रहते हैं तब तक मांग अथवा आपूर्ति से उत्पन्न कोई भी स्थिति इस अनुपात को अशांत नहीं कर सकती। दोनों ही
- इन अनुपातों के लिए देखिएµएच.एच. गिब्स द्वारा लिखित पुस्तक ए.कोलोक्यू ऑन करेंसी के अनुलग्नक
तालिका ख