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रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन

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तक कि सोना चांदी से लगभग 15 या 15 ½ गुना महंगा हो फिर भी शायद इस तथ्य की व्याख्या 15 ½ ः1 के स्थायी अनुपात में पायी जाती है जिसके अनुसार उन धातुओं का विनिमय फ्रांस और अन्य कुछ महाद्वीपीय देशों की मुद्रा में किया जा सकता है। वर्ष के फ्रैंच मुद्रा कानून XI ने एक कृत्रिम ख्1, समीकरण की स्थापना कीµ

‘‘सोने की उपयोगिता = 15½ x चांदी की उपयोगिता और शायद ऐसा किसी बिना कारण नहीं है कि वोलोवस्की और हाल के अन्य फ्रांसिसी अर्थशास्त्रियों ने सोना और

  1. यही यह द्धिधातु की कृत्रिमता है जो दुर्भाग्यवश कुछ लोगों के मस्तिक को धुंधला करती हैं तथा अन्य

लोगों के मन को पूर्वाग्रह से ग्रस्त करती हैं। कुछ व्यक्ति यह नहीं समझ पाते कि मुद्रा के रूप में उपयोग

की दो गई वस्तुओं के मूल्य निर्धारण किन्हीं अन्य दो वस्तुओं के मूल्य निर्धारण से इतना अलग होना

चाहिए जो कानून द्वारा निर्धारित अनुपात द्वारा शासित किया जाए। अन्य व्यक्ति उलझन में पड़ जाते हैं

कि यदि सोना और चांदी का स्थानापन्न जोड़ा है तो क्या उन्हें विधि सम्मत अनुपात की आवश्यकता

होनी चाहिए जबकि स्थानापन्न के अन्य जोड़े विधि सम्मत अनुपात के बिना अपनी उपयोगिता के अनुपात

के आधार पर केवल परिचालित होते हैं। प्रोफेसर फिशर ने इन कठिनाइयों की व्याख्या इस प्रकार की

हैः

‘‘----------मुद्रा के दो स्वरूप वस्तुओं बेतरतीब जोड़े में स्थानापन्न होने से अलग-अलग होते हैं।

दो प्रमुख स्थापना उपभोक्ता द्वारा एकाकी वस्तु माने जाते है। इस प्रकार दो वस्तुओं को एकत्र करने से

मांग की दशाओं की संख्या कम हो जाती है परन्तु समस्या में किसी भी अनिश्चितता को प्रारंभ नहीं

करती क्योंकि लुप्त दशाएं शीघ्र ही प्रतिस्थापन के नियम अनुपात द्वारा शीघ्र ही आपूर्ति की जानी हैं।

इस प्रकार यदि गन्ने की दस पौंड शक्कर चुकंदर की ग्यारह पौंड शक्कर के समान एक जैसे प्रयोजन

की पूर्ति कर देती है तो उनके प्रतिस्थापन का नियत अनुपात 10ः11 का होगा--------- ऐसे मामलों

में यह नियत अनुपात आम आवश्यकता को पूरा करने के लिए दो वस्तुओं की तुलनात्मक क्षमताओं

पर आधारित है ओर उनके मूल्यों पर नितांत पूर्ववर्ती है-------- प्रतिस्थापन अनुपात प्रकृति द्वारा

निर्धारित किया जाता है और इसके एवज में मूल्य का अनुपात निर्धारित किया जाता है। ‘‘फिर भी

मुद्रा के एकाकी मामले में प्रतिस्थायी का कोई नियत अनुपात नहीं है------------ हम तुलनात्मक

मिठास की शक्ति, तुलनात्मक पोषण की शक्ति, मांगों की पूर्ति करने के लिए अन्य क्षमता, धातुओं की

आंतरिक क्षमता तथा उनके मूल्यों की स्वतंत्रता को व्यवहार में नहीं लाते। इसके बजाए हम तुलनात्मक

क्रय शक्ति को व्यवहार में लाते हैं। हम धातु में ही उपयोगिता को नहीं देखते परंतु उन वस्तुओं में

उपयोगिता को देखते हैं जो धातु से खरीदी जाएंगी। हम उनकी संबंधित वांछनीयताओं अथवा उपयोगिताओं

को शक्कर को सौंप देते हैं---------- इससे पूर्व कि हम उनकी कीमतों का पता करें। परंतु हमें

सोने और चांदी केद तुलनात्मक परिचालक मूल्य का पता करना चाहिए ताकि हम यह जान सकें कि

किस अनुपात में हम उनकी कीमत स्थापित करते हैं। हमारे लिए प्रतिस्थापन का अनुपात संयोगवश

कीमत का अनुपात है। मुद्रा के दो रूपों का मामला विरल है। वे प्रतिस्थायी होते हैं परंतु वे प्रतिस्थापन

के साथ कोई प्राकृतिक अनुपात नहीं रखते अपितु उपभोक्ता के कार्य-निष्पादन पर आश्रित होते हैं।’’

ऊपर बताए गए विचारों---------उन व्यक्तियों द्वारा अनदेखी की जाती हैं जो इस बात की जांच

करते हैं कि नियत वैध अनुपात पहले से ही निश्चित आपूर्ति और मांग की पद्धति पर पुनः आरोपित

किया गया है और इससे वे यह सिद्ध करते हैं कि यह अनुपात पहले से ही असफल होना सुनिश्चित

है............अनुरूपता ----अप्रामाणिक करती हैं-----------सोना और चांदी------ पूर्णतया अनुरूप

नहीं होते यहां तक कि दो प्रतिस्थापन के साथ अनुरूपता स्थापित नहीं कर पाते क्योंकि मुद्रा के दो

स्वरूपों के कारण प्रतिस्थापन के उपभोक्ताओं के प्राकृतिक अनुपात नहीं होते हैं इसलिए कृत्रिम अनुपात

के लिए स्थान दिखाई देता है----------------’’ µपरचेजिंग पावर ऑफ मनी (मुद्रा की क्रय

शक्ति) 1911, पृ. 376-77’’