रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन
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होगी, अन्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि दोनों बुलियनों का बाजार अनुपात टकसाल के अनुपात के समान हो जाएगा। परंतु यदि चांदी के बुलियन की आपूर्ति में वृद्धि और सोने में कमी ऐसी हो कि चांदी के बुलियन को मुद्रा में ढालने से चांदी के बुलियन का स्तर पुराने स्तर पर आ जाता है परंतु सोने के बुलियन को मुद्रा से बाहर करने पर सोने के बुलियन का स्तर पुराने स्तर पर आने में पर्याप्त नहीं होता अथवा मुद्रा से सोने का अलग करना सोने के बुलियन के स्तर को पुराने स्तर तक पहुंचा देता है परंतु चांदी को सिक्के में ढालने से चांदी-बुलियन के स्तर को पुराने स्तर तक कहीं पहुंच पाता तो द्विधातुवाद को असफल होना चाहिए, अन्य शब्दों में कहा जा सकता है कि दोनों बुलियनों का बाजार अनुपात इन दोनों सिक्कों के मध्य विधिसम्मत स्थापित टकसाल अनुपात से अलग रहेगा।
इन दोनों संभावनाओं में से किस संभावना के अंतर्गत 1873 के बाद ऐसी परिस्थितियां पैदा हुइंर् जिनका ”ास हुआ? यह ऐसा प्रश्न है जिसके बारे में कोई भी निश्चित रूप से नहीं कह सकता। यहां तक कि जैवॉन्स भी बाद की अवधि में इसकी सफलता के बारे में अधिक आशावादी नहीं थे जिन्होंने पूर्व-अवधि में द्विधातु के कानून की सफलता को स्वीकार किया था। ख्1,
‘‘द्विधातुवाद का प्रश्न ऐसा है जो कोई संक्षिप्त और सरल उत्तर को स्वीकार नहीं करता। मुख्यतया यह एक ऐसी समस्या है जिसका हल नहीं ढूंढा जा सकता। इसमें कई परिवर्तनीय संख्याएं और कई स्थायी संख्याएं निहित होती हैं। दूसरी स्थिति में या तो ये शुद्ध रूप से जानी नहीं जाती अथवा कई मामलों में बिल्कुल ही अज्ञात होती हैं-------’’ स्थिति चाहे कुछ भी क्यों न हो यह निश्चित है कि द्विधातु पद्धति के अंतर्गत टकसाल-अनुपात और बाजार-अनुपात के मध्य भिन्नता अवश्य कम होनी चाहिए अपेक्षाकृत जहां द्विधातु पद्धति नही होती। जब कभी टकसाल-अनुपात से बाजार-अनुपात भिन्न होता है तो द्विधातु कानून के अंतर्गत क्षतिपूरक कार्रवाई-संतुलन को पुनर्जीवित करती है और यदि यह पुनर्जीवित करने में जहां कहीं भी असफल होती है यह इन दोनों अनुपातों के बीच की खाई को भरने में सफल हो जाती है। इस प्रकार की स्थिति में यह तर्क देना ठीक है कि यदि 1873 के बाद चांदी का विमुद्रीकरण न किया गया होता तो सोने और चांदी के बीच अनुपात शायद सुरक्षित कर लिया गया होता क्योंकि यह स्थिति पूर्व-अवधि के मुद्रा-संबंधी अशांत वातावरण में विद्यमान थी। किसी भी स्थिति में यह निश्चित है कि इन दोनों धातुओं के बीच बाजार का अनुपात उस सीमा तक टकसाल-अनुपात से अलग नहीं हो सका जैसाकि वास्तव में था। ख्2,
इनवैस्टीगेशन आदि (संपादित फॉक्सवैल) पृ.317
फिशर प्रचेजिंग पावर ऑफ मनी, 1911 पृष्ठ 134-35