98 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अतः 18वें दशक में मुद्रा संबंधी कानून की दुःखद व्याख्या है कि यदि इसने वास्तव में किसी उद्देश्य के लिए इसके सृजन में सहायता नहीं की तो यह समस्या पहले जैसी ही अज्ञात थी और इसने निश्चय ही स्थिति को अधिक बिगाड़ने में सहायता की। 1870 से पूर्व सभी देशों में आम मुद्रा नहीं थी। भारत और पश्चिम यूरोप के कुछ ऐसे देश थे जिनका नितांत आधार चांदी था और इंग्लैंड तथा पुर्तगाल जैसे अन्य देशों में विशेष रूप से सोना ही आधार था। फिर भी इनमें से कोई भी परस्पर लेन-देन में आम मानक-मूल्य का अभाव महसूस नहीं कर पाए। जब तक फ्रांस और लैटिन संघ में नियत अनुपात पद्धति विद्यमान थी तो वास्तव में यह समस्या बनी रही क्योंकि इस समस्या के अंतर्गत दोनों धातुएं एक होकर काम करती रहीं और इस प्रकार एक आम मानक तैयार हुआ यद्यपि सभी देशों ने एक जैसी धातु का उपयोग अपनी मानक मुद्रा के रूप में नहीं किया अतः ऐसे अधिकांश देशों के लिए यह तुलनात्मक उपेक्षा का मामला था जिन्होंने किस धातु को उस एक देश के समान उस समय तक उपयोग किया जिसने किसी भी निश्चित परिभाषित अनुपात से उपयोग किया था। इस नियत अनुपात के समाप्त करने से इस मामले में अधिक चिंता उत्पन्न हो गई जबकि यह मामला तुलनात्मक उपेक्षा का था। प्रत्येक देश जिसने आम मुद्रा के बिना आम अंतर्राष्ट्रीय मानक के लाभ का आनंद उठाया, उसे ऐसे संघर्ष का सामना करना पड़ा जिसमें आम मानक के प्राप्त करने के लिए अपनी मुद्रा के त्याग अथवा अपनी मुद्रा से बंधे रहने और आम मानक के लाभ न उठाने के मध्य विकल्प था। आम मानक की आवश्यकताएं अंततोगत्वा इसकी असफलता की ओर उन्मुख हुई और यह स्थिति इस प्रकार थी कि जैसी कि उसे होना चाहिए। परंतु लोगों को अधिक हानि और कुछ भारी बोझ के दबने से पूर्व यह तथ्य नहीं था कि उसके अभाव का वस्तुतः उनके लिए क्या अर्थ हुआ।