112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भारत के व्यापार में केवल वृद्धि ही नहीं हो रही थी, बल्कि उसी समय उसके उद्योगों के स्वरूप में भी साथ ही साथ काफी परिवर्तन भी हो रहा था। 1870 से पहले भारत तथा इंग्लैंड एक तरह से कहा जाए तो गैर-स्पर्द्धा वाले समूह थे। नौ-संचालन (नेविगेशन) नियमों की संरक्षणवादी नीति के कारण तथा उत्पादन के क्षेत्र में मनुष्य के स्थान पर मशीनरी के प्रतिस्थापन के कारण भी भारत पूर्णतया कृषि प्रधान तथा कच्चे माल का उत्पादन करने वाला देश हो गया था। जबकि इंग्लैंड ने अपने आपको एक ऐसे देश के रूप में परिवर्तित कर दिया था जिसने अपना ऊर्जा तथा अपने स्रोतों को उस कच्चे माल को जिसे विदेश से आयात किया जाता था फिर परिष्कृत माल के रूप में परिवर्तित किया जाता था। दो देशों के औद्योगिक व्यवसाय में कितनी स्पष्ट विषमता थी उसे उनके अलग-अलग निर्यात के विश्लेषण द्वारा तालिका XV में स्पष्ट दर्शाया गया है।
1870 के बाद, उनके औद्योगिक व्यवसाय के वितरण में भारी परिवर्तन हुआ और भारत एक बार फिर एक निर्माता देश की भूमिका अदा करने लगा। 1870 के बाद के 20 वर्षों के भारत के आयात तथा निर्यात के संबंधित आंकड़ों का विश्लेषण करने से हमें यह पता चलता है कि निर्माण की दिशा में प्रगति उस अवधि की सबसे महत्वपूर्ण व सार्थक विशेषता थी। देखें (तालिका XVI )
तालिका XVI
भारत के औद्योगिक व्यवसाय में परिवर्तनऽ
| Ok"kZ |
vk;kr | Col3 | fu;kZr | Col5 |
|---|---|---|---|---|
| Ok"kZ |
||||
1879 1892 Ok`f¼ dk izfr'kr |
#i;k 25]98]65]827 36]22]31]872 39 |
#i;k 13]75]55]837 26]38]18]431 91 |
#i;k 5]27]80]340 16]42]47]566 211 |
#i;k 59]67]27]991 85]52]09]499 43 |
वार्षिक योग 2.8 6.5 15 3
ऽ भारतीय अर्थशास्त्र पर रानाडे के निबंध से उद्धृत µपृष्ठ 104
औद्योगिक विकास में यह परिवर्तन दो मुख्य उत्पादनों/निर्माणों की वृद्धि से स्पष्ट होता था। उनमें से एक कपास का उत्पादन था। कपास/रूई का उद्योग भारत के प्राचीनतम उद्योगों में से एक था। परन्तु 1750 और 1850 के बीच 100 वर्ष के दौरान, इसमें इतनी गिरावट आई कि यह पूर्ण जीर्णता की स्थिति में पहुंच गया था उन्नीसवीं शताब्दी के छठे दशक में इस उद्योग को पूंजीवादी आधार पर पुनर्जीवित