रजत मानक तथा इसकी अस्थिरता के दोष
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करने का प्रयास किया गया। फलतः इसमें शीघ्र ही तेज प्रगति के लक्षण दिखाई दिए। इसकी प्रगति की कहानी को संक्षेप में तालिका XVII में लिखित रूप में, स्पष्ट समझाया जा रहा हैःµ
तालिका XVII
भारतीय कपास में व्यापार तथा उद्योग का विकास
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23 52 51 74 89 5]236 3]988 5]477 5]330 4]660 33]55 33-35 44-34 49-09 44-79 |
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48 58 81 114 143 1]000 1]471 2]037 2]935 3]712 10 13 16 22 34 --- 39]537 61]836 99]224 --- |
एक दूसरा उद्योग जूट था जिसके निर्माण व उत्पादन का विस्तार भारत में व्यापक रूप में हुआ। भारत के रूई उद्योग के विपरीत, जूट उद्योग को उद्भव रूई उद्योग की तुलना में नया था। रूई/कपास उद्योग के विकास से इस उद्योग का विकास व वृद्धि अलग थी। इसकी वृद्धि यूरोपीय धन, यूरोपीय प्रबंधन तथा यूरोपीय कौशल द्वारा प्रोत्साहित हुई थी। इस उद्योग की जड़ें शीघ्र ही रूई/कपास उद्योग के समान ही गहरी पहुंच गई और यह कार्य रूई उद्योग से यदि अधिक बेहतर नहीं तो उसके बराबर समृद्ध अवश्य हो गया था। इसका इतिहास एक निरंतर प्रगति का इतिहास था अर्थात् इसमें निरंतर प्रगति होती चली गई, जैसा कि तालिका XVIII से पता चलेगा (अगले पृष्ठ पर देखें)