3. रजत मानक और इसकी अस्थिरता के दोष - Page 129

114 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तालिका XVIII

जूट उद्योग तथा व्यापार का विकास

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उत्पादनों/निर्माण की दिशा में वृद्धि की इस प्रवृत्ति का अप्रत्यक्ष प्रभाव भारतीय कृषि पर बड़े बिना नहीं रहा। भारतीय कृषि भी इनके उत्पादन के अप्रत्यक्ष प्रभाव से अछूती नहीं रही। यह कहा जा सकता है कि 1870 से पहले भारतीय किसान का दृष्टिकोण वाणिज्यिक नहीं था। वह अपनी खेती लाभ के लिए उतनी नही करता था जितनी अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं में आत्मनिर्भरता के लिए करता था। अर्थात् उतनी ही खेती करता था जिससे उसकी अपनी आवश्यकता पूरी हो सके। 1870 के बाद कृषि का रूझान एक व्यापार की ओर हो गया और फसलों का निर्धारण किसान की घरेलू आवश्यकताओं के अनुरूप होने के बजाए, उत्तरोत्तर बाजार की कीमतों पर होने लगा। इसे तालिका XIX में स्पष्ट दर्शाया गया है। (अगले पृष्ठ पर देखें)

इस समय प्रचलित आर्थिक स्थितियों में ऐसी विषमता दो देशों में विद्यमान थी। रजत (चांदी) मान वाले देश की प्रवृत्ति दृढ़ता से प्रगति करने की ओर तथा स्वर्णमान वाले देश की प्रवृत्ति गतिरोध व ठहराव की ओर होने की हो गई थी। इस विलक्षण घटना ने अनेक पर्यवेक्षकों को चिंता में डाल दिया। यह कहा जाता है कि अंग्रेजी निर्माताओं का अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में डटे रहने में असमर्थ होना इसका मुख्य कारण