3. रजत मानक और इसकी अस्थिरता के दोष - Page 131

116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

चाहिए था जहां तक एक सामान्य व एक समान मान के उपस्थित होने के कारण जिस स्थिति में व्यापार करना पड़ता था, वह स्थिति अनिश्चितताओं से उन्मुक्त थी, उसे तत्काल स्वीकार कर लिया गया था। परन्तु यह दावा किया जाता था कि ऐसा कोई कारण नहीं था कि व्यापार के पृथक्करण के एक भाग के रूप में भारतीय निर्माता के लिए संभव था कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूर्वी बाजार से अपने अंग्रेज प्रतिद्वन्द्वी को बाहर निकाल देता। (देखिए तालिका XX )।

तालिका- XX

कपड़े के सामान का पूर्वी बाजारों में निर्यात

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1884­
1885­
1886­
1887­
1888­
1889­
1890­
1891­
7]927­
15]600­
21]332­
25]682­
26]901­
30]786­
45]378­
49]877­
65]897­
78]242­
91]804­
113]451­
128]907­
141]950­
169]253­
33]086­
36]467­
38]951­
46]426­
47]479­
34]370­
33]499­
38]856­
33]061­
26]924­
35]354­
44]643­
35]720­
37]869­
27]971­
15]544­
17]545­
22]517­
25]800­
30]424­
29]911­
41]534­
55]565­
47]909­
51]578­
53]406­
69]486­
70]265­
59]496­
67]666­
394]489­
382]330­
523]921­
509]099­
587]177­
454]948­
415]956­
439]937­
562]339­
490]451­
618]146­
652]404­
557]004­
633]606­
595]258­

व्यापार की ऐसी गड़बड़ पर जिन कारणों का प्रभाव पड़ा, उन पर गरमागरम वाद-विवाद व बहस होने लगी। ख्1, विवाद का विषय यह था कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में जिस प्रकार के परिवर्तन हो रहे थे क्या उनका कारण उस मुद्रा संबंधी अव्यवस्था व गड़बड़ थी। जो लोग इस विचार के समर्थक थे और इस कारण को स्वीकार करते थे, वे अपनी स्थिति को यह तर्क देकर स्पष्ट करते थे कि विनिमय में गिरावट व ”ास ने भारतीय उत्पादक को तो आनुतोषिक इनाम दिया और अंग्रेजी उत्पादक को

  1. स्वर्ण तथा रजत पर शाही आयोग (1886) के समक्ष प्रो. मार्शल तथा निकल्सन द्वारा साक्षी तथा ज्ञापन

देखिए। प्रो. लेक्किस भी इकोनॉमिक जनरल, खंड-5, 1895 से ‘‘दि एंजिओ ऑन गोल्ड एंड इंटरनेशनल

ट्रेड।’’