116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
चाहिए था जहां तक एक सामान्य व एक समान मान के उपस्थित होने के कारण जिस स्थिति में व्यापार करना पड़ता था, वह स्थिति अनिश्चितताओं से उन्मुक्त थी, उसे तत्काल स्वीकार कर लिया गया था। परन्तु यह दावा किया जाता था कि ऐसा कोई कारण नहीं था कि व्यापार के पृथक्करण के एक भाग के रूप में भारतीय निर्माता के लिए संभव था कि अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूर्वी बाजार से अपने अंग्रेज प्रतिद्वन्द्वी को बाहर निकाल देता। (देखिए तालिका XX )।
तालिका- XX
कपड़े के सामान का पूर्वी बाजारों में निर्यात
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| 1877 1878 1879 1880 1881 1882 1883** ** 1884 1885 1886 1887 1888 1889 1890 1891 |
7]927 15]600 21]332 25]682 26]901 30]786 45]378 49]877 65]897 78]242 91]804 113]451 128]907 141]950 169]253 |
33]086 36]467 38]951 46]426 47]479 34]370 33]499 38]856 33]061 26]924 35]354 44]643 35]720 37]869 27]971 |
15]544 17]545 22]517 25]800 30]424 29]911 41]534 55]565 47]909 51]578 53]406 69]486 70]265 59]496 67]666 |
394]489 382]330 523]921 509]099 587]177 454]948 415]956 439]937 562]339 490]451 618]146 652]404 557]004 633]606 595]258 |
व्यापार की ऐसी गड़बड़ पर जिन कारणों का प्रभाव पड़ा, उन पर गरमागरम वाद-विवाद व बहस होने लगी। ख्1, विवाद का विषय यह था कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में जिस प्रकार के परिवर्तन हो रहे थे क्या उनका कारण उस मुद्रा संबंधी अव्यवस्था व गड़बड़ थी। जो लोग इस विचार के समर्थक थे और इस कारण को स्वीकार करते थे, वे अपनी स्थिति को यह तर्क देकर स्पष्ट करते थे कि विनिमय में गिरावट व ”ास ने भारतीय उत्पादक को तो आनुतोषिक इनाम दिया और अंग्रेजी उत्पादक को
- स्वर्ण तथा रजत पर शाही आयोग (1886) के समक्ष प्रो. मार्शल तथा निकल्सन द्वारा साक्षी तथा ज्ञापन
देखिए। प्रो. लेक्किस भी इकोनॉमिक जनरल, खंड-5, 1895 से ‘‘दि एंजिओ ऑन गोल्ड एंड इंटरनेशनल
ट्रेड।’’