रजत मानक तथा इसकी अस्थिरता के दोष
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दंड दिया। अर्थात् ”ास मान विनिमय की स्थिति से भारतीय उत्पादक को लाभ हुआ और अंग्रेज उत्पादक को हानि/इस आनुतोषिक के संबंध में यह कहा जाता था कि वह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के क्षेत्र में स्थापित व जमे हुए प्रतियोगियों की स्थिति को बदलने के लिए जिम्मेदार था। इस अनुतोष/इनाम का अस्तित्व एक साधारण सी गणना पर आधारित था। यह कहा जाता था कि यदि चांदी के स्वर्ण मूल्य में गिरावट आती थी तो भारतीय निर्यातक को अपने उत्पाद के लिए अधिक रुपये मिलते थे और इसलिए उसकी स्थिति बेहतर थी। जबकि उसी तथ्य के कारण अंग्रेज उत्पादक को अपेक्षाकृत कम स्वर्ण मुद्राएं (सावरिन) मिलती थी इसलिए उसकी स्थिति खराब थी। सहज रूप में यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि ”ासमान विनिमय ने भारतीय निर्यातकों को आनुतोषिक प्रदान किया और अंग्रेज निर्यातकों पर जुर्माना थोप दिया था। इस तर्क में गणित के एक सूत्र की अंतिम अवस्था निहित थी। वास्तव में, इसके रचयिताओं द्वारा यह सूत्र इतना स्वयं सिद्ध माना जाता था कि उससे उस समय के व्यापार तथा औद्योगिक स्थिति पर इसके आचरण व प्रभाव के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण अनुमान निष्कर्ष निकाले गए थे। ऐसा ही एक निष्कर्ष यह था कि इसने चांदी का प्रयोग करने वाले देशों से निर्यात को प्रोत्साहित किया और आयात को रोका।
भारतीय व्यापार का वितरण *
प्रत्येक पांच वर्ष के लिए वार्षिक औसत (दस लाख मिलियन) रुपयों मेंµ
| ns'k |
1875&76 ls 1879&80 rd | Col3 | Col4 | 1880&81 ls 1884&85 rd | Col6 | Col7 |
|---|---|---|---|---|---|---|
|
~~ dqy ;ksx~~ | ~~ dqy ;ksx~~ | ||||
phu tkiku Jhyadk tyMe: eè; ds vfèkokl |
14-05 -02 5-74 10-83 |
132-27 -33 22-97 26-11 |
146-32 -35 28-71 26-94 |
19-23 -19 5-35 15-88 |
134-94 2-09 16-37 33-65 |
154-17 2-28 21-72 49-53 |
प्रत्येक पांच वर्ष के लिए वार्षिक औसत (दस लाख मिलियन) रुपयों मेंµ
| ns'k |
1885&86 ls 1889&90 rd | Col3 | Col4 | 1890&91 ls 1894&95 rd | Col6 | Col7 |
|---|---|---|---|---|---|---|
| ns'k |
vk;kr | fu;kZr | dqy ;ksx | vk;kr | fu;kZr | dqy ;ksx |
phu tkiku Jhyadk tyMe: eè; ds vfèkokl |
21-64 -25 5-86 20-09 |
134-54 7-27 20-56 42-54 |
156-18 7-52 26-42 62-63 |
28-69 1-51 6-42 23-32 |
133-30 14-44 31-18 52-56 |
161-90 15-95 37-60 75-88 |
ऽ इस अवधि के दौरान भारतीय व्यापार का विवरण