स्वर्ण मानक की ओर
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स्वर्ण मुद्रा की परियोजना के संबंध में उसका इतना दृढ़ संकल्प था कि वह अनुपात को बदलकर स्वर्ण के अनुकूल बनाने के लिए तैयार था। अनुपात का प्रश्न एक ऐसा प्रश्न था जिसे ‘‘भारत सरकार को इतनी योग्यता होनी चाहिए कि वह इसका निश्चय कर सके। ये वे प्रश्न हैं जिनको ऐसे प्रत्येक राष्ट्र द्वारा किया गया है जिसने स्वर्ण मुद्रा को अपनाया है। इसमें संदेह नहीं कि यह एक कठिन तथा महत्वपूर्ण समस्या है, परन्तु यह ऐसी नहीं कि इसका समाधान न हो सके और इसका समाधान किया ही जाना चाहिए।’’
स्वर्ण मुद्रा के लिए प्रथम प्रस्ताव की ऐसी रूपरेखा प्रस्तुत की गई थी। चांदी के मूल्य में गिरावट शुरू होने से पहले ही इसे प्रकट कर दिया गया था और इसलिए यह चांदी के अनुवर्ती अवमूल्यन के उपाय की अपेक्षा विगत नीति की पराकाष्ठा अधिक थी। संभवतः उसमें प्रस्ताव की मुख्य शक्ति निहित थी। उस मुद्रा को ढोने की लागत को टालने के लिए यह एक अच्छा समय था जो बाद में बहुत अधिक निवारक सिद्ध हुई और उसने अन्य अनेक परियोजनाओं को रद्द किया। इसके अलावा, वह नहीं कहा जा सकता कि उस समय जब ज्ञापन प्रस्तुत किया गया था तो सरकार को आसन्न संकट के संबंध में चेतावनी नहीं दी गई थी, क्योंकि चांदी के विमुद्रीकरण करने की लहर दो वर्ष पहले से ही, चल चुकी थी। ख्1, परंतु कुछ कारणवश जो जनता को ज्ञात नहीं है, प्रस्ताव पर कोई कार्यवाही नहीं की गई। स्वर्ण मुद्रा की शुरुआत करने के लिए दूसरी योजना भारत के योग्य टकसाल विशेषज्ञ (मिंट मास्टर) कर्नल जे.टी. स्मिथ की थी। उसकी योजना प्रकट रूप में ”ासमान विनिमय क उपाय थी। ख्2, योजना को ‘‘सिल्वर एंड दि इंडियन एक्सचेंज’’ (रजत तथा भारतीय विनिमय) ख्3, पुस्तिका में प्रकाशित प्रथम निबंध में घोषित किया गया था। उसको उसी के शब्दों में निम्नलिखित रूप में दिया जा सकता हैःµ
‘‘6. यद्यपि इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारतीय विनिमय को उसकी सामान्य स्थिति में पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य की पूर्ति की कठिनाई अब उसकी अपेक्षा बहुत अधिक है जितनी कुछ वर्ष पहले होती, इसका कारण वह गिरावट है जो पहले हो चुकी है फिर भी इस बात में विश्वास करने का पर्याप्त आधार दिखाई पड़ता है कि अब भी यदि निश्चित किए गए उपायों को अपना लिया जाए तो घरेलू
- जब यह प्रस्ताव किया गया था, उस समय लार्ड नार्थबुक भारत का वायसराय था। उसने आई. सी.सी.
1898 के समक्ष अपने साक्ष्य में प्र. 8.447 में यह सुझाव दिया था कि इसको उस समय न अपनाने का
कारण यह था कि ‘‘उस समय स्वर्ण का मूल्य बढ़ रहा था और उसे एकत्रित करना असंभव था।’’
इसमें संदेह नहीं कि यह प्रस्ताव प्रस्तुत होने के बहुत दिन बाद विचार के लिए सामने आया था, इस
परिकल्पना के अलावा यह बात ऐतिहासिक दृष्टि से असत्य है।
- यह पहले, छठा दशक के दौरान भारत में सॉवरेन के साथ यूनिट के रूप में स्वर्णमान के प्रवेश/प्रारंभ
के लिए आंदोलन में भाग ले चुका था। परंतु वह अंतरराष्ट्रीय सिक्के में एकरूपता के लिए आंदोलन के
समर्थक के रूप में था। भारत के लिए स्वर्ण मुद्रा तथा ब्रिटिश सॉवरेन के प्रवेश/प्रारंभ के लिए माप/
उपाय के प्रस्ताव पर उसकी अभ्युक्ति आदि लंदन 1868
- लंदन, एल्फिंगम विल्सन 1876