स्वर्ण मानक की ओर
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लेगी इसकी शक्ति उसके हाथ में होगी। स्वर्ण बुलियन को सरकार द्वारा 38 रुपये, 14 आना प्रति मानक औंस की टकसाल दर पर प्राप्त किया जाना चाहिए और उसके अशर्फी (सॉवरेन) तथा आधी अशर्फी (अर्ध-सॉवरेन) में (38 रुपये 15 आने की) या उसी मूल्य के दस या पांच रुपये के सिक्के बनाए जाने चाहिए और उन्हें वैध मुद्रा घोषित कर दी जानी चाहिए, परंतु वह अभियाचनीय न हो। चांदी का वर्तमान रुपया, पहले की भांति ही वैध मुद्रा के रूप में जारी रहेगा। ख्1, ’’
जिस समय स्मिथ योजना प्रस्तुत की गई थी, उस समय चांदी की गिरावट इतनी अधिक महसूस हुई थी कि योजना के पक्ष में अत्यधिक समर्थन प्राप्त हो रहा था। व्यापारी समुदाय का समर्थन बंगाल चैम्बर ऑफ कॉमर्स के 15 जुलाई, 1876 के प्रस्ताव में सम्मिलित किया गया, जिसमें यह आग्रह किया गया ‘‘कि सरकार द्वारा अपनाए जाने वाले किसी भी मूल उपाय की दृष्टि से यह आवश्यक है कि 1870 के अधिनियम 23 की धारा 16 ने भारत में टकसालों के लिए यह अनिवार्य कर दिया कि वह मुद्रा निर्माण के लिए प्रदत्त समस्त चांदी को प्राप्त करे और 1871 के अधिनियम 3 के अनुच्छेद (बी), धारा 11, ने भी मुद्रा विभाग के लिए यह अनिवार्य कर दिया कि उनके पास जो चांदी बुलियन भेजा जाए उसके बदले नोटों को जारी करना सरकार विवेक से अस्थायी रूप में स्थगित रखें और यह कि ऐसे आस्थगन के दौरान या आगामी सूचना तक, किसी भी विदेशी बंदरगाह से सिक्के में ढले रुपये का आयात करना वैध न बनाया जाए।’’ इसी प्रकार का विचार कलकत्ता ट्रेर्ड्स एसोसिएशन द्वारा प्रस्तुत किया गया। इस समय तक विनिमय में गिरावट भी शुरू हो गई थी, जिसका प्रभाव भारत सरकार के वित्त पर इतना अधिक पड़ा कि सर विलियम म्यूर को 1876.77 के अपने वित्तीय विवरण में यह कहना पड़ाµ
‘‘चांदी के अचानक अवमूल्यन और उसके फलस्वरूप इंग्लैंड में प्रतिवर्ष लगभग 15 मिलियन पाउंड की अपेक्षित राशि को निर्धारित करने के कारण, भारत सरकार के
खर्च की वृद्धि से निस्संदेह भविष्य के लिए गंभीर स्थिति प्रतीत होने लगी। वास्तव में यह कहा जा सकता है कि किसी भी दृष्टि से विचार किया जाए, खतरा उससे भी अधिक गंभीर है जिससे अब तक भारत की आर्थिक स्थिति को भय रहा है। युद्ध अकाल तथा सूखा के खर्चे के कारण राजकोष को प्रायः कहीं अधिक हानि हुई है, जिसका कि हमें वर्तमान वर्ष में भय है। परन्तु ऐसी आपदाएं निकल जाती हैं, हानि सीमित होती है और जब इसके लिए व्यवस्था कर दी जाती है तो अर्थव्यवस्था को फिर निश्चित तथा स्थिर आधार मिल जाता है। वर्तमान चिंता का कारण यह नहीं है।
- इसका हिसाब रुपया-पाउंड विनिमय 2 कि स्वर्ण बनाने के लिए लगाया गया था। 1876 में रुपया पाउण्ड
विनिमय औसत 15.9.645 था इससे सोने का थोड़ा-सा अधिमूल्य हो जाता, जो निस्संदेह उसके सिक्के
के बंद हो जाने के फलस्वरूप रुपये के मूल्यांकन के कारण जल्दी ही गायब हो जाता।