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स्वर्ण मानक की ओर

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‘‘यदि गड़बड़ का पता सोने के मूल्य में वृद्धि के कारण चलता है तो निर्दिष्ट उपायों का स्वरूप उससे स्पष्ट रूप में अलग होगा जो चांदी ख्3, के मूल्य में गिरावट के मामले से उपयुक्त होता।’’

इन संभावनाओं में से जो बात प्रमाणित होने वाली प्रतीत हुई वह यह थी कि ‘‘सोने के मूल्य में मार्च, 1872 से वृद्धि हुई थी’’ ख्1, और इसलिए यदि कोई सुधार करना था तो उसका उत्तरदायित्व स्वर्णमान वाले देशों पर होना चाहिए। उस समय भारत सरकार की जैसी स्थिति थी उसमें राहत लाने वाले किसी प्रकार के मुद्रा सुधार में जल्दी होने की अधिक बुराई के बिना उसे स्वयं ही हानि उठानी पड़ सकती है। मुद्रा के सुधार जैसे, महत्वपूर्ण मामले के संबंध में अपने निर्णय को नियमित करने के संकट की आवश्यकताओं की अनुमति का अर्थ यह नहीं है कि उसमें हठ की भावना थी। इसके विपरीत यह एक चेतावनी है। 13 अक्तूबर, 1876 की उस स्पष्ट विज्ञप्ति की प्रशंसा किए बिना कोई पाठक नहीं रह सकता जिसमें सैक्रेटरी ऑफ स्टेट को अपने इस निर्णय की सूचना दी गई थी कि वे प्रतीक्षा करें और देखें। परन्तु भारत सरकार के इसके मूल में निहित दृष्टिकोण के विषय में उसी प्रकार के सिफारिशी तरीके से प्रशंसा करना संभव नहीं था, क्या यह बात समझना संभव है कि सोने के मूल्य में तो वृद्धि हुई थी, परन्तु चांदी का मूल्य कम नहीं हुआ था। इस बात का निर्णय करने का काम तर्कशास्त्रियों पर छोड़ दिया जाए। परन्तु रजत मान वाले देश के लिए अपनी मुद्रा प्रणाली के सुधार को आरंभ करने से इस आधार पर इनकार कर देना कि सोने के ही मूल्य में वृद्धि हुई थी, वास्तव में एक सामरिक गलती थी। सैनिक मामलों में संभवतः एक ऐसी चीज होती है, जो एक स्थिति पर निर्भर करती है, परन्तु मुद्रा के मामलों में, ऐसी चीज नहीं हो सकती। इसका कारण यह है कि पहले मामले में शक्ति, दूसरे की कमजोरी में निहित होती है। परन्तु बाद वाले मामले में एक की कमजोरी सबकी कमजोरी हो जाती है। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि सरकार ने, इस मामले में आवश्यक कार्रवाई करने के दायित्व की अवहेलना करके, उसी प्रकार की गलती की जैसी कि प्रो. निकल्सन ख्2, के शब्दों में ‘‘एक ऐसा व्यक्ति करता है जो यह मान बैठे कि उसका जलयान डूब नहीं सकता, क्योंकि उस कक्ष विशेष में जिसमें वह सोता है कोई रिसाव नहीं है।’’

निष्क्रियता की ऐसी प्रवृत्ति अनुचित व मूर्खतापूर्ण थी, इसे भारत सरकार को शीघ्र ही समझा दिया गया। दो वर्ष की अल्पावधि के दौरान ही उसने 1876 में जो स्थिति अपनाई थी, उस पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य होना पड़ा। 9 नवम्बर, 1878 ख्3, की एक विज्ञप्ति में भारत सरकार ने यह कहाµ

  1. कामंस पेपर, 1893 का पैरा 16

  2. मनी एंड मोनीटरी प्राब्लम्स, 1895 पृ.90

  3. 1886 का पी पी सी 4868 पृ.18