4. स्वर्ण मानक की ओर - Page 153

138 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘‘5. यह आशा की जाती थी कि इस प्रकार की कठिनाइयों से युक्त एक समस्या का इतना जल्दी निर्णय नहीं होना चाहिए और इसकी गंभीर समस्या के अंतिम समाधान के लिए प्रयास करने से पहले कुछ और समय गुजरने देना, कदाचित सबसे बुद्धिमत्तापूर्ण काम था क्योंकि निश्चय ही यही सबसे अच्छा स्वाभाविक तरीका था। सन् 1877 में चांदी के मूल्य में हुए सुधार से इस नीति के क्रियान्वयन का समर्थन हुआ और केवल यही वह समय था जब रुपये के मूल्य में नए ”ास के कारण मूल्य गिरकर जुलाई, 1876 के मूल्य के बराबर ही रह गया। मुद्रा सम्बन्धी वर्तमान कानून के कारण हमें जो भारी जोखिम उठाना पड़ता है उसका व्यावहारिक प्रभाव हमारे गृह प्रेषणों पर पड़ता है जिससे हमें उधर ध्यान देने के लिए बाध्य होना पड़ता है।

ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ

‘‘21. चांदी के मूल्य के सम्बन्ध में जो अनिश्चितता अब कुछ वर्षों से विद्यमान रही है और उसके फलस्वरूप विनिमय में जो गड़बड़ हुई है......वह सरकार के लिए निरंतर कठिनाई का कारण रही है।........ और इस बात में संदेह करना संभव नहीं है कि देश के व्यापारी सौदों में भी इन गड़बडि़यों के कारण इसी प्रकार के परिणाम निकालते या कि भारत में व्यापार या अन्य कार्यों में विदेशी पूंजी निवेश के संबंध में उनके प्रभाव से बहुत भारी बाधा पड़ती।

‘‘23. इस प्रकार इसे हम वर्तमान कठिनाइयों का सच्चा विवरण तथा वर्तमान मुद्रा कानून को बनाए रखने का संभावित जोखिम मानते हैं और हमारा विश्वास है कि उनमें किसी प्रकार की अतिश्योक्ति नहीं की गई। इस बात की जांच-पड़ताल करना हमारा काम है कि क्या कोई ऐसा व्यावहारिक उपाय किया जा सकता है जिस पर कोई गंभीर आपत्ति न हो या उसे अपनाने में इतने बड़े जोखिम न हों कि उसका निषेध करना पड़े। हम इस बात को पूर्णतया महसूस करते हैं कि भारत की मुद्रा के संबंध में कार्रवाई करते समय हमारे ऊपर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होगी। परन्तु यह बात भी साफ है कि कुछ न करने की जिम्मेदारी भी किसी प्रकार कम बड़ी नहीं है। कानून को चाहे यथावत छोड़ा जाए या उसे बदला जाए, इसका परिणाम बराबर हमारी कार्रवाई के कारण ही होगा, और यदि हम चाहें तब भी इस गंभीर स्थिति का सामना करने से हम उसे टाल नहीं सकते।

‘‘24. स्वर्णमान के अपनाने से विनिमय में स्थिरता लाने के लिए तथा सरकार की सीधी कार्रवाई द्वारा चांदी की मुद्रा के लिए सोने के प्रतिस्थापन को हमारे विचार से निष्कर्षतः भारत सरकार की विगत अक्तूबर की विज्ञप्ति द्वारा अव्यावहारिक बताया गया है। इसलिए इस योजना पर आगे किसी प्रकार ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है। उस विज्ञप्ति के रुपये के भार में वृद्धि भी ध्यान में आई। यह वृद्धि समान रूप में ध्यान देने के योग्य नहीं है। क्योंकि वास्तव में यह भविष्य के लिए सुरक्षा प्रदान नहीं करेगी और किसी उद्देश्यपूर्ण आवश्यक बात को पूरा किए बिना अनिवार्य रूप से बहुत खर्चीली होगी। इसके लिए एक सरल तथा प्रथम प्रस्तावित सुझाव रहता है, चांदी के सिक्के ढलाई की सीमा का जिसे यद्यपि भारत सरकार द्वारा 1876