4. स्वर्ण मानक की ओर - Page 155

140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

‘‘37. (ऐसे) उदाहरण (जैसे ब्रिटिश शिलिंग तथा फ्रांस का पांच फ्रेंक के सिक्के) यह दर्शाते हैं कि न तो गुप्त सिक्का ढलाई, न आंतरिक मूल्य के अवमूल्यन से उत्पन्न अविश्वास के कारण इस बात की संभावना है कि रुपये को अपने वर्तमान वजन पर, दो शिलिंग के नाममात्र के मूल्य पर एक स्वर्णमान तथा एक आंशिक स्वर्ण सिक्के के साथ प्रचलन में बनाए रखने में कोई बड़ी कठिनाई होती।

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  1. इस प्रकार हम इस सामान्य निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि भारत की चांदी की वर्तमान मुद्रा को बनाए रखते समय स्वर्णमान को अपनाना व्यवहार्य होगा इससे समूचे समाज को न तो कोई हानि पहुंचेगी और न भविष्य में किसी प्रकार की कठिनाई का जोखिम होगा और उससे हम भविष्य में, अपने ऊपर आने वाले गंभीर वास्तविक

खतरों से उस समय तक अपनी स्वयं की पूर्णतया रक्षा कर सकेंगे जब तक वर्तमान प्रणाली को बनाकर रखा जाएगा। फलतः हम महारानी की सरकार से यह सिफारिश करना चाहते है कि ऐसे परिवर्तन को यथासंभव शीघ्र से शीघ्र अपना लिया जाए और हम उन उपायों को आवश्यक ब्यौरों सहित आगे समझाएंगे जिनके सम्बन्ध में हमारा यह परामर्श है कि उन्हें लागू करना चाहिए।

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‘‘50. यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हमारी कार्रवाई का उद्देश्य भारत पर स्वर्ण मुद्रा को थोपना या रजत मुद्रा को विस्थापित करना या हटाना नहीं है। बल्कि ऐसे परिणाम का निराकरण करना व टालना है या उस दिशा में आने वाली प्रवृत्ति को वहां तक रोकना है जहां तक उसे स्वर्णमान के अपनाने के साथ निरंतर किया जा सकता है। इसके फलस्वरूप, हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि भारत में स्वर्ण के सिक्कों के प्रवेश के लिए सुविधा प्रदान करते समय हमें अभी उन्हें सामान्य वैध मुद्रा के रूप में घोषित नहीं करना चाहिए और साथ ही साथ हमें चादी के सिक्कों के निर्माण के लिए व्यवस्था करनी चाहिए उनकी मात्रा की कोई सीमा नहीं रखनी चाहिए, बल्कि ऐसा इन शर्तों पर हो कि उससे चांदी के प्रवेश को सोने के संबंध में कोई सुविधा नहीं मिलेगी।

‘‘51. इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए हमारा निम्नलिखित प्रस्ताव हैःµ ‘‘हम सर्वप्रथम सरकार की किसी भी मांग के लिए भुगतान में ब्रिटिश या ब्रिटिश भारतीय स्वर्ण प्राप्त करने के लिए अधिकार प्राप्त करें। यह भुगतान सरकार द्वारा समय-समय पर निर्धारित दरों पर होना चाहिए और यह उस समय तक हो जब तक विनिमय पर्याप्त रूप में स्वयं व्यवस्थित न हो जाए और उससे हम इतने समर्थ न हो जाए कि रुपये के मूल्य को पाउंड-स्टर्लिंग के संबंध में स्थायी रूप में दो शिलिंग पर स्थिर कर सकें। इसके साथ ही साथ, चांदी के सिक्के बनाने पर सामंती कर को ऐसी दर तक बढ़ा दिया जाएगा जिससे, वास्तव में रुपये का मूल्य बुलियन का आयात करने वाले व्यक्तियों के लिए उपयुक्त सोने के सिक्कों की तुलना में रुपये को प्रदत्त मूल्य की राशि के बराबर हो जाए। अतएव