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स्वर्ण मानक की ओर

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हमें एक स्वचालन वाली प्रणाली अपनानी चाहिए जिसके अधीन चांदी को सिक्का बनाने के लिए सोने की निर्धारित दर पर स्वीकार किया जाएगा। ऐसा करना देश की आवश्यकता के लिए अपेक्षित है। सोने के सिक्के को चलाना तथा प्रयोग निश्चित सीमित क्षेत्र प्रदान जहां तक उस सुविधाजनक तथा लाभदायक पाया जाएगा वहां तक उसका कुछ प्रतिबंधित सीमा तक प्रयोग किया जाएगा, चलाया जाएगा।’’

ऐसी थी वह योजना जिसकी भारत सरकार द्वारा रूपरेखा प्रस्तुत की गई थी। इसने स्मिथ की योजना को क्यों अस्वीकार कर दिया था, यद्यपि स्मिथ की योजना सरल, मितव्ययी तथा सुरक्षित थी, फिर भी उसने उसे अस्वीकार क्यों कर दिया था, इसका कारण यह था कि इसमें विश्व के सोने के क्षीयमान व घटते स्टाक के संबंध में भारत की मांग पर विचार किया गया था। उस समय मौजूद परिस्थितियों में, यह एक बहुत बड़ा दोष था और उस समय की सत्ता ने पहले ही निश्चय कर लिया था कि भारत को ‘स्वर्ण के लिए छीना झपटी’ की स्थिति से बाहर पूरी तरह से रखा जाना चाहिए। इसलिए एक प्रभावी स्वर्णमान का प्रस्ताव रखना उसके लिए पराजय का स्वीकार करना था। स्वर्णमान का एक मामूली तथा तनुकृत संस्करण जैसा कि सरकार द्वारा प्रस्तावित किया गया था, कुल मिलाकर ऐसा था जिसे सफलता मिल सकती थी। परन्तु इस कमजोर प्रयास पर भी सेक्रेटरी ऑफ स्टेट तथा चांसलर ऑफ दि एक्सचेकर द्वारा संयुक्त रूप में नियुक्त समिति ख्1, द्वारा अच्छा व्यवहार नहीं किया। इस समिति की नियुक्ति इन प्रस्तावों की जांच करने और रिपोर्ट देने के लिए की गई थी। समिति के सब सदस्य इस बात पर एकमत थे ‘‘कि उन पर महारानी ख्2, की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए वे सिफारिश नहीं कर सकते’’ इन प्रस्तावों को क्यों अस्वीकार कर दिया गया, उसके कारणों का पता लगाने या जानने की हमें अनुमति नहीं है। यद्यपि इस समिति की रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से जनता के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, परन्तु उसकी कार्यवाही को कभी प्रकट नहीं किया गया। वास्तव में अधिकारी ने उनका अवलोकन करने की अनुमति नहीं दी और उन्होंने उनका अवलोकन व अध्ययन करने के अनुरोध को कठोरता व दृढ़पूर्वक अस्वीकार कर दिया था। इस बात की कल्पना करना मुश्किल है कि उनको लगभग आधी शताब्दी के बीत जाने के बाद भी गोपनीय क्यों माना गया। तथापि, इस समिति के एक सदस्य सर राबर्ट गिफन ने 1898 ख्3, की भारतीय मुद्रा समिति के समक्ष साक्ष्य देते समय बहुत स्पष्ट कर दिया था, जिससे हमें अत्यंत संरक्षित इस प्रलेख की विषय-वस्तु की जानकारी मिल सकती है। ऐसा प्रतीत होता है कि समिति ने प्रस्तावों के विरुद्ध इसलिए घोषणा की थी क्योंकि इस समिति ने यह सोचा कि ये प्रस्ताव भारतीय मुद्रा को एक ‘‘प्रबंध’’ मुद्रा बनाने के हैं। जिस समय समिति ने अपना मत प्रकट किया था तब प्रचलित पूर्वाग्रह, पूर्णतया ऐसी प्रणाली के विरुद्ध था। मुद्रा के

  1. इस समिति में लुइस मैलेट, एडवर्ड स्टेन होय, टी एल सिकोम्बो, आर ई वैलबी, टी एच फरर, आर

गिफन तथा ए जे बालफोर थे।

  1. समिति के प्रतिवेदन के लिए, कामन्स का शोधपत्र 1886 का पत्र (सी) 4868 पृ. 26 देखिए।
  2. प्रश्न 10,025-50