142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जानकर प्रसिद्ध लेखकों को कृत्रिम रूप में विनियमित प्रणाली के विरोधी घोषित कर दिया गया। ख्1, स्वाभाविक रूप में उनकी आदर्श मुद्रा स्वचालित मुद्रा थी। इस पूर्वाग्रह द्वारा भ्रमित होने के अतिरिक्त, समिति इस बात से आश्वस्त थी कि आर्थिक शक्तियों की स्वाभाविक कार्यप्रणाली से स्थिति स्वयं ही शीघ्र सुधर जाएगी। इसके लिए भारतीय मुद्रा का सुधार करना आवश्यक नहीं होगा। समिति के इस विश्वास का आधार स्वर्गीय वाल्टर बेगहोट ख्2, की यह मान्यता थी कि अव्यवस्था केवल अस्थायी ही हो सकती है। उसका तर्क यह था कि अवमूल्यन के कारण भारत से निर्यात को प्रोत्साहन मिलेगा और आयात हतोत्साहित होगा और इस प्रकार व्यापार में जो प्रतिकूल संतुलन उत्पन्न होगा वह भारत की ओर चांदी के प्रवाह को प्रेरित करेगा जिससे चांदी के मूल्य में वृद्धि का रुख होगा। उसका मत यह भी था कि चांदी के लिए बढ़ती मांग भारत के बाहर से भी होगी। उसने यह तर्क दिया कि कुछ देशों द्वारा चांदी के विशुद्धीकरण करने के कारण उत्पन्न मांग में गिरावट उसकी अपेक्षा अधिक होगी जिसकी क्षतिपूर्ति इस समय सिक्का के भुगतान के उनके आसन्न पुनर्ग्रहण के लिए कागज की मुद्रा के आधार पर अन्य देशों द्वारा चांदी को अपनाकर की गई हो।
समिति द्वारा कृत्रिम मुद्रा प्रणाली की तुलना में प्राकृतिक मुद्रा प्रणाली को वरीयता दिए जाने के सम्बन्ध में चाहे जो कहा जाए पर इस बात में कोई संदेह नहीं हो सकता कि इस आशा में कि चांदी की वसूली हो जाएगी प्रस्ताव को अस्वीकार कर देना पूर्णतया धोखा था। जिन मूल पूर्वानुमानों पर समिति कार्रवाई करने के लिए प्रेरित हुई थी वे सही नहीं निकले। यह देखकर प्रत्येक व्यक्ति को आश्चर्य हुआ कि भारत ने अंग्रेजों के इस तर्क को अस्वीकार कर दिया। उस समय इस बात को जानना वास्तव में एक पहेली थी कि यदि यूरोप में चांदी में इतनी अधिक गिरावट आ गई थी तो यह भारत में भारी मात्रा में क्यों नहीं गई। अनेक लोगों ने सैक्रेटरी ऑफ स्टेट पर यह दोष लगाया कि उसने अपनी कौंसिल के बिलों ख्3, को बेच दिया। यह कहा गया था कि इन बिलों ने भेजी हुई रकम का इतना अधिक बेहतर वैकल्पिक तरीका प्रस्तुत किया था जो भारत में चांदी के भेजने को रोकता था और इसलिए इसके परिणामस्वरूप इसके लिए मांग में कमी हुई। यह बात साफ है कि यहां दृष्टिकोण सही नहीं था। ख्4,
- उस समय यह विचार इतना नरवीन था कि सं.रा. अमरीका के मानीटरी कमीशन, 1876 को तब आश्चर्य
हुआ जब कुछ साथियों ने यह कहा कि एक देश की मुद्रा प्रणाली में लेखे की मुख्य धात्विक यूनिट
का विनियमन सरकारी एजेंसी द्वारा किया जाना चाहिए। देखिए, 44 कांग्रेस द्वितीय अधिवेशन सीनेट
प्रलेख सं. 703 पृष्ठ 47-48
- वादी के अवमूल्यन पर उसके कुछ लेख तथा उसके संबंधित कुछ विषयों पर कुछ लेख, लन्दन 1877
पृ.10,55 तथा 80 चांदी के अवमूल्यन पर से प्रवर (सेलेबद्ध) समिति के समक्ष उसकी साक्षी थी लॉर्ड्स
पेपर 1876 का 178 प्र.1,361-1, 450
- यह तर्क मुख्य रूप से चांदी के अवमूल्यन प्र डेप्रिशिएशन ऑफ सिल्वर 1876 की प्रवर समिति की
रिपोर्ट (पृ.30-35) में प्रस्तुत किया गया था तथा स्वर्ण एवं रजत आयोग, 1886 के एक धातुµसदस्यों
द्वारा भी अंतिम रिपोर्ट भाग-2 के पृ.77-79 पर प्रस्तुत किया गया था।
- स्वर्ण तथा रजत आयोग, 1988 के समक्ष प्रो. मार्शल का साक्ष्य प्र. 10 पृ. 16476