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स्वर्ण मानक की ओर

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यदि कौंसिल के बिलों को समाप्त भी कर दिया जाता तो भी चांदी की मात्रा भारत में उससे अधिक न जाती जितनी पहुंच गई थी। कौंसिल के बिलों को साधारण व्यापार हुंडी ही माना जाना चाहिए जिन्हें सेवाओं तथा वस्तुओं के प्रति तैयार किया गया था। उनके विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने व्यापार हुण्डियों में प्रदत्त तरीके से भिन्न किसी विशेष तरीके से बुलियन के सम्प्रेषण के साथ प्रतियोगिता की थी। कौंसिल की हुण्डियों का एकमात्र अभिप्राय जो प्रस्तुत विषय पर आधारित था इस तथ्य में निहित है कि जिस सीमा तक वे सौदे सामने आए उन्होंने भारत को अन्य वस्तुओं की खरीदारी करने से रोका। परन्तु ऐसा कुछ नहीं था जो उसको खरीदने की शेष शक्ति को रोक सके। वह शक्ति कौंसिल की हुंडियों के कारण दंड भोगने/ दाम चुकाने के बाद, अन्य वस्तुओं की तुलना में चांदी की खरीद में प्रयुक्त होने से बची थी। इस क्रयशक्ति का उपयोग चांदी को खरीदने के लिए किया जाएगा क्योंकि यूरोप में उसका अवमूल्यन हो गया था, श्री ब्रेगहोट का यह पूर्वानुमान सिद्धांत रूप में एक गलत पूर्वानुमान था इसका निर्णय करने वाली बात यह भी थी कि क्या भारत में इसके मूल्य में वृद्धि हुई या नहीं। केवल इस बात के कारण ही चांदी का भारत की ओर प्रवाह हो सकता था। परन्तु उस समय जो स्थिति थी, उसके संबंध में प्रो.पियरसन ख्1, का यह मत था कि जब चांदी का सामान्य अवमूल्यन सारे विश्व में ही प्रारंभ हो गया था तो उसे विश्व के उस भाग में जिसमें भारत है पहले से ही रोकने का प्रबंध किया गया। भारत में चांदी की पहले से ही भरमार थी। साधारण परिस्थितियों में भारत अपनी चांदी के बहुत बड़े हिस्से को वापिस यूरोप में भेज देता, परन्तु सामान्यतया अवमूल्यन ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। और अब दो विरोधी शक्तियां सामने आईं। एक शक्ति का झुकाव यूरोप से चांदी का निर्यात भारत को करने की ओर था और दूसरी का झुकाव भारत से चांदी का निर्यात यूरोप को करने की ओर था। यद्यपि इन दोनों में यूरोप से भारत को चांदी के निर्यात करने की ओर प्रवृत्त शक्ति अधिक प्रबल थी परन्तु भारत से यूरोप को चांदी का निर्यात करने की ओर प्रवृत्त शक्ति इतनी अधिक शक्तिशाली थी कि वह यूरोप से भारत को निर्यात होने वाली चांदी की कितनी भी भारी मात्रा को रोक सकती थी। यदि समिति ने अपने पूर्वानुमान के एक अंश में धोखा खाया ही था पर दूसरे में भी उसे निराशा ही हाथ लगी। चांदी के रूप में सिक्के का भुगतान पुनः आरंभ होने के बजाए जैसी कि बे्रगहोट को उन देशों के द्वारा उस समय कागज के आधार पर ऐसा करने की आशा थी, उन सभी ने चांदी का अवमूल्यन कर दिया। इससे उन सभी लोगों को भारी निराशा हुई जिन्होंने ‘‘प्रतीक्षा करो और देखो’’ की नीति का सहारा लिया था।

ऐसे पूर्वानुमानों को भारत तथा अन्य देशों द्वारा झूठा साबित करने के कारण यूरोप के अधिकांश देशों के दृष्टिकोण में परिवर्तन आया और इन देशों का उस समय

  1. स्वर्ण तथा रजत आयोग, 1886 के परिपत्र के बारे में उनका उत्तर द्वितीय रिपोर्ट परिशिष्ट-7 (1) पृष्ठ

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