144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
अस्त व्यस्त मुद्रा को किसी प्रकार की व्यवस्थित करने की दिशा में कोई अभिरुचि नहीं दिखाई। प्रतिष्ठित विशेषज्ञों द्वारा उनको परामर्श दिया गया कि वे जल्दी न करें। जेवन्स ने कहा ख्1, -
‘‘व्यावहारिक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने के लिए हमें केवल थोड़े से धैर्य तथा सहज बुद्धि की आवश्यकता है। अगले कुछ वर्षों के अंदर भारत में अच्छी फसल होने की पूर्ण संभावना हैµ जिससे भारत हमारी सब फालतू चांदी को खरीदने में समर्थ हो जाएगा, जैसा कि वह प्लिनी के समय से कुछ अपवादों को छोड़कर हमेशा करता रहा है। आगामी वर्षों में चादी की किसी भी मात्रा से बिना किसी हानि के छुटकारा पाया जा सकता है यदि इसे धीरे-धीरे तथा सावधानीपूर्वक बेचा जाएगा।’’
जब यह पता चला कि प्रतीक्षा की अवधि यदि अपेक्षाकृत अधिक लम्बी नहीं तो अधिक दुखदायी अवश्य होगी। क्योंकि उसकी अपेक्षा अधिक दुखद तथा लम्बी होगी जितनी कहावत वाले किसान की अवधि थी जिससे चश्में को सूखा रहने दिया जाए ताकि उसे मना करने पर भी वह अपने पैरों को गीला न होने दे। चांदी के अवमूल्यन को रोकने के लिए आवश्यक सुधार प्रारंभ करने के लिए यूरोप में एक आंदोलन शुरू हुआ।
यह आंदोलन भावात्मक ही नहीं था, बल्कि वास्तविक आंदोलन था। इसने इन बुराइयों से शक्ति प्राप्त की थी जो विद्यमान मुद्रा स्थिति से उत्पन्न हुई थी। इनमें से अधिकांश देशों में मुद्रा की स्थिति बहुत खराब थी। सांकेतिक मुद्रा के रूप में चांदी के साथ एक प्रभावी स्वर्ण मुद्रा की योजना को उनकी प्रगति के बीच में ही रोक दिया गया था। जर्मनी ने जब चांदी का विमुद्रीकरण किया तो उसने अपने चांदी के थ्रेलर को, सोने के साथ पुराने अनुपात में पूर्ण विधिमान्य मुद्रा के रूप में रोके रखा था। उसने ऐसा केवल इसलिए किया था ताकि उसे उनसे मुक्त होने के लिए उतना समय मिल जाए जितना उनको कम करके एक सच्ची सहायक स्थिति तक जाने के लिए आवश्यक था परंतु उसके ऐसा कर सकने से पहले ही उसकी विमुद्रीकरण की नीति प्रारंभ हो चुकी थी जिसका प्रभाव चांदी के मूल्य पर पड़ा और उसकी निरंतर गिरावट ने जर्मनी को थ्रेलर्स को उनके पुराने मूल्य पर विधिमान्य मुद्रा के रूप में बनाए रखने के लिए बाध्य कर दिया था। उस तथ्य के बावजूद भी कि उनके धातुक मूल्य में तेजी से गिरावट आ रही थी यथार्थ रूप में लैटिन देशों के संघ की अपनी मुद्रा प्रणाली से संबंधित की गई कार्रवाई का परिणाम भी वैसा ही था। उन्होंने चांदी के पांच फ्रैंक के सिक्के आगे बनाना बंद कर दिया था। परन्तु वे उनके संबंध में कुछ नहीं कर सके जिनका निर्माण पहले ही हो चुका था। वे केवल यह ही कर पाए कि उन्होंने टकसाल के अपने पुराने अंकित मूल्य पर वितरित करने व चलाने की अनुमति दे दी यद्यपि धात्वीय अंकित मूल्य में परिवर्तन, सोने तथा चांदी के बाजार मूल्य में परिवर्तन के साथ ही जारी रहा। संयुक्त राज्य अमरीका भी इसी प्रकार की बुराइयों में फंसा था। यद्यपि उन बुराइयों का जन्म आवश्यकता से नहीं बल्कि इच्छा से हुआ था अर्थात् वे बुराइयां आवश्यकताजन्य नहीं बल्कि इच्छाजन्य थी। चांदी वाले लोगों के आंदोलन
- ओपी पृ.354