146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गए आंकड़े पर्याप्त रूप में उन कठिनाइयों को प्रमाणित करते हैं जिन कठिनाइयों को इन देशों का सांकेतिक मुद्रा की इतनी बड़ी राशि को विनियमित तथा नियंत्रित करने में सामना करना पड़ा।
यदि इंग्लैंड जैसा स्वर्णमान वाला देश इन कठिनाइयों से बच सका था तो केवल इस कारण कि देश दूसरे देश इससे समान रूप से कष्ट में थे। जैसा पहले कहा गया है मूल्य में निरंतर गिरावट व सोने के मूल्य में परोक्ष रूप से वृद्धि के कारण देश के व्यापार तथा उद्योग में इतनी अधिक गिरावट आई थी कि ऐसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। इसके अलावा धन संबंधी अव्यवस्था व गड़बड़ का प्रभाव पूंजीगत निवेश की उपज पर पड़ा, जो उसके बहुत से लोगों का मुख्य सहारा था। ऐसा रोजगार के क्षेत्र में कमी होने के कारण हुआ। अमरीकी आयोग का कहना थाः-
‘‘1877 से 1897 के दौरान इन बीस वर्षों में यह कहना कदाचित सही होगा कि रुपये की लाभांश कमाने की शक्ति कम होकर आधी या उसके आसपास रह गई थी। पूंजी की लाभ कमाने की शक्ति की कमी का उन सभी पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा जो आजीविका के लिए निवेश पर निर्भर रहते थे। इसका प्रभाव उद्योग के संचालकों तथा वित्त के स्वामियों के लाभ तथा जोखिमों पर भी पड़ा। इंग्लैंड तथा फ्रांस में सरकारी प्रतिभूतियों के मूल्य में इतनी अधिक वृद्धि हो गई कि छोटे साधन वाले व्यक्ति के लिए उनमें पूंजी निवेश करना और अपने दुर्दिनों के दौरान पर्याप्त सहायता प्राप्त करना अब संभव नहीं था।’’ ख्1,
निःसंदेह, यह बात संशयपूर्ण है कि क्या जो निष्कर्ष निकाला गया है वह ठीक है। परन्तु तथ्य यह है कि धन संबंधी अव्यवस्था के कारण अंग्रेजी का पूंजी निवेश का क्षेत्र अत्यंत प्रतिबंधित हो गया था और जीविका प्राप्त करने के लिए तरीके के रूप में पूंजी निवेश अंग्रेजों के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन था।
ऐसी स्थिति को सुधारने के लिए एक के बाद एक तीन अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा सम्मेलन हुए। इनका उद्देश्य सोने तथा चांदी के बीच एक साम्यस्थापित एक द्विधात्वीय मूल्य स्थापित करना था प्रथम अंतर्राष्ट्रीय मानीटरी सम्मेलन, संयुक्त राज्य के नियंत्रण पर 1878 में पेरिस में किया गया। द्वितीय सम्मेलन उसी स्थान पर 1881 में फ्रांस तथा संयुक्त राज्य के संयुक्त आह्वान पर किया गया। तीसरा तथा अंतिम सम्मेलन संयुक्त राज्य की इच्छा पर सन् 1892 में ब्रसल्स में हुआ।
स्थिति ऐसी गंभीर थी कि उसके कारण इन सम्मेलनों में इससे अधिक स्वाभाविक और कुछ नहीं हो सकता था कि इन सम्मेलनों से यह आशा की जाती है कि वे उस
- अंतर्राष्ट्रीय विनिमय संबंधी आयोग द्वारा चीन तथा चांदी का प्रयोग करने वाले अन्य देशों में स्वर्ण विनिमय
मान आरंभ करने संबंधी 58वीं कांग्रेस, द्वितीय अधिवेशन, प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव)
की रिपोर्ट था प्रलेख नं. 144 वाशिंगटन 1903 पृ.101