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स्वर्ण मानक की ओर

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परियोजना के उपयोग संबंधी एक करार व समझौते को फलदायक बनाएंगी। जिसके लिए उन सम्मेलनों को बुलाया गया था। परन्तु किसी समझौते पर पहुंचने के बजाए इन सम्मेलनों में हुए विचार-विमर्श पूर्णतया असफल सिद्ध हुए। केवल द्वितीय सम्मेलन में समझौते के कुछ आसार दिखाई पड़े थे। पहले तथा तीसरे सम्मेलन में विपरीत दिशा में एक प्रबल परिवर्तन दिखाई दिया। इन विचार-विमर्शों के परिणामस्वरूप यदि कोई प्रगति हुई थी तो वह संक्षेप में यह थी कि चांदी के मुद्रा के प्रयोग को बनाए रखना तथा उसमें वृद्धि करना आवश्यक था। परन्तु कुल मिलाकर प्रतिक्रिया इतनी दुर्बल थी कि प्रचलन द्वारा इस महत्वपूर्ण घोषणा की सच्चाई को प्रमाणित नहीं किया जा सका।

ये सम्मेलन द्विधातुक समझौते पर पहुंचने में असफल क्यों रहे इसके कारण को समुचित रूप में समझा नहीं गया। इन सम्मेलनों पर द्विधातुवाद संबंधी वाद-विवाद को इस बात का ध्यान रखे बिना नहीं पढ़ा जा सकता कि विरोधी पक्षों ने इस विषय को भिन्न उद्देश्यों से प्रस्तुत किया था। एक पक्ष मत का मुख्य उद्देश्य, सोने तथा चांदी के बीच विनिमय के स्थिर अनुपात को बनाए रखना था, इसमें इस प्रश्न का कोई लिहाज नहीं था कि उनमें से वितरण में एक रहें या दोनों। दूसरे पक्ष का मत था कि दो धातुओं को समवर्ती परिचालन में रखा जाए। उनके दृष्टिकोण में इस अंतर के परिणामस्वरूप द्विधातुक परियोजना पर समझौता होना प्रायः असंभव हो गया था।

सोने तथा चांदी के बीच एक स्थिर अनुपात को बनाए रखने में द्विधातुवाद की व्यावहारिकता वास्तव में एक अनिश्चित संभाव्यता है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि क्या इन सम्मेलनों में हुए वाद-विवाद को मार्गदर्शक के रूप में माना जा सकता है। इसके स्थिर अनुपात के अर्थ में एक सफल द्विधातुक प्रणाली की संभावना को इन सम्मेलनों में शामिल हुए अधिकांश आर्थिक सिद्धांत वादियों या सरकारों द्वारा नकार दिया गया था। इसके विपरीत, 1881 के सम्मेलन, जो इन तीनों में सबसे महत्वपूर्ण था, इस प्रणाली की व्यवहार्यता को स्वीकार करने की दृष्टि से असाधारण था। कुछ छोटी सरकारों को छोड़कर सभी सरकारें इसके पक्ष में थीं। यहां तक कि ब्रिटिश सरकार के विषय में भी यह कहा जा सकता है कि उसने बैंक चार्टर एक्ट की चांदी संबंधी धारा को लागू करने की स्वीकृति देकर उसका अनुमोदन कर दिया था।

परन्तु दो धातुओं को समवर्ती प्रचलन में बनाए रखने के लिए, प्रक्रिया के एक अंश के रूप में द्विधातुवाद ने क्या विश्वास दिलाया था? द्विधातुवादी दोहरे मानक की स्थिरता के समर्थन में फ्रांस का उदाहरण दिया करते थे। परन्तु क्या फ्रांस में द्वि धातुक प्रणाली के अंतर्गत समवर्ती प्रचलन था? इससे भी अलग था। क्योंकि यद्यपि इस प्रणाली का यह गुण था कि दो धातुओं के उत्पादन में परिवर्तन से विनिमय के निर्धारित अनुपात में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं आया, फिर भी इसमें थोड़ी बहुत जो कुछ बातें हुईं, वे दो धातुओं के सापेक्ष वितरण व प्रचलन में सबसे बड़ी क्रांति को लाने के लिए पर्याप्त थी। जैसा कि पृष्ठ 131 तालिका XXIV स्पष्ट दर्शाती हैःµ