स्वर्ण मानक की ओर
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जाएगा। अनुपात की स्थिरता, बहुत बड़ी सीमा तक, एक अंतर्राष्ट्रीय समझौते पर निर्भर थी। क्योंकि इसे एक राष्ट्र की कार्रवाई द्वारा बनाए रखा जा सकता था, पर उस स्थिति में अनुपात से विचलन संभवतः और अधिक होता। परन्तु केवल मात्र अंतर्राष्ट्रीय समझौते में अपनी स्वयं की ऐसी कोई शक्ति नहीं होती जो एक धातु को दूसरी धातु को बाहर निकालने से रोक सके। इस बात को मान लेना बिल्कुल गलत है ग्रेशम का नियम, अंतर्राष्ट्रीय समझौते के अंतर्गत शक्तिहीन है। ग्रेशम का नियम मुद्रा की गति की कुल आवश्यकता के लिए, दो धातुओं के सापेक्ष तुलनात्मक उत्पादन द्वारा नियंत्रित होता है। मान लिया जाए कि एक धातु का उत्पादन दूसरी धातु की तुलना में इतना भारी था कि वह मुद्रा के लिए आवश्यकता से भी बहुत अधिक था, तो अंतर्राष्ट्रीय समझौता पहली धातु की, दूसरी धातु को प्रचलन से पूर्णतया बाहर करने की प्रक्रिया को कैसे रोक सकता है? इसके विपरीत, अंतर्राष्ट्रीय समझौता इस प्रक्रिया को हतोत्साहित करने के बजाए प्रोत्साहित करेगा।
इसलिए द्विधातुवाद को अपनाकर, राष्ट्रों को एक स्थिर अनुपात तथा एक समवर्ती प्रचलन के बीच चयन करना पड़ा था क्योंकि एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो सकती थी जिसमें एक स्थिर अनुपात तो होता, परंतु दोनों धातुओं का समवर्ती प्रचलन न होता। यदि सम्मेलन भंग हुआ था तो इसका कारण यह नहीं था कि उन्होंने इस संभावना को मान्यता नहीं दी, जिसे 1886 के स्वर्ण तथा रजत आयोग जैसे निष्पक्ष न्यायाधिकरण द्वारा सर्वसम्मति से माना गया था, यह संभावना एक द्विधातुक प्रणाली के अंतर्गत एक स्थिर अनुपात को बनाए रखने की थी। वे इसलिए भंग हुए थे क्योंकि द्विधातुक प्रणाली ने दो धातुओं के समवर्ती व प्रचलन की कोई गारंटी नहीं दी थी। तथापि यदि द्विधातुवाद का तात्कालिक प्रभाव स्वर्ण का प्रचलन में प्रवाह होता तो यह निश्चित है कि समवर्ती प्रचलन की असंभावना से ऐसी कमी व असुविधा न होती। परंतु उस समय जैसी स्थिति थी तात्कालिक प्रभाव चांदी को प्रचलन में लाने के लिए होता। यही एक कारण था जिसके कारण अधिकांश राष्ट्र द्विधातुक प्रणाली को अपनाने से डर गए। यह एक अजीब बात है कि जो राष्ट्र सोने तथा चांदी के बीच एक स्थिर अनुपात लाने के लिए एक साथ एकत्रित हुए थे उन्हीं ने एक ऐसी प्रणाली को अस्वीकृत कर दिया जिसने अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण आधार पर ऐसी स्थिरता का आश्वासन दिया था जो सोने से चांदी के प्रचलन की संरचना को बदलने के लिए प्रभावी थी। परन्तु इस तथ्य को मानना चाहिए कि जिस समय द्विधातुक प्रणाली के पुनर्गठन का प्रश्न जनता के मस्तिष्क को आंदोलित कर रहा था, तब यूरोप के अधिकांश देशों में सोना तथा चांदी को मुद्रा के लिए समान रूप से अच्छा मानना छोड़ दिया था। सोने के परिमाण व मात्रा में अधिक मूल्य के वाहक के रूप में सोने को चांदी से श्रेष्ठ माना जाता था। इस श्रेष्ठता को उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में अधिकाधिक महत्व दिया जाने लगा था और स्थिरीकरण की ऐसी किसी योजना को जनसाधारण का अनुमोदन मिलने की संभावना नहीं थी जिसमें सोने के अबाध प्रचलन की व्यवस्था नहीं थी। यह पूर्वाग्रह केवल इंग्लैंड जैसे स्वर्ण मान वाले देश तक ही सीमित नहीं