150 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
था। लैटिन संघ द्वारा टकसाल को बंद करना, द्विधातुक देशों के दृष्टिकोण में परिवर्तन का सकारात्मक प्रमाण है। जैसा कि जीवोन्स ने तर्क दिया है ख्1,
‘‘जब तक... इसके प्रचालन के कारण पुराने भारी ईकस के बदले में उनके स्थान पर सोने के पांच फ्रेंक के सिक्के, नेपोलियन तथा अर्धनेपोलियन के सुन्दर सिक्के मिलते रहे तब तक कोई शिकायत नहीं हुई और फ्रांसीसी लोग अपनी प्रतिपूरक प्रणाली की प्रशंसा करते रहे। परन्तु जब (1873 के बाद) यह बात स्पष्ट हो गई कि चांदी की भारी मुद्रा फिर वापिस आ रही है तो इस मामले ने एक अलग रूप धारण कर लिया।’’
सोने के प्रति पूर्वाग्रह इतना भारी था कि विभिन्न सम्मेलनों में मुख्य शक्तियों के हितों के विषय में यह सच कहा जा सकता है कि उनमें उनके स्वर्ण की निधि ख्2, में परिवर्तन के साथ ही वे मोम की तरह पिघलने लगे। 1878 में संयुक्त राज्य सम्मेलन को बुलाने में इसलिए अगुआ रहा था क्योंकि हैंड एलिसन एक्ट की कार्यप्रणाली ने उसके नकद भुगतान को आवश्यक सोने के अंतर्वाह को रोक दिया था। जर्मनी इसलिए तटस्थ उदासीन था क्योंकि उसके पास सोना पर्याप्त मात्रा में था और वह अपनी विमुद्रीकृत चांदी को बिना किसी हानि के बेचने के लिए आश्वस्त था। सन् 1881 में फ्रांस तथा जर्मनी ने सुधार के लिए अपेक्षाकृत अधिक उत्सुकता इसलिए दिखाई थी क्योंकि फ्रांस ने अपना सारा सोना गंवा दिया था और जर्मनी अपनी चांदी को किसी के गले मढने में असमर्थ था। 1892 तक किसी देश में सोने की इतनी कम आपूर्ति नहीं थी जितनी कम संयुक्त राज्य में थी, ऐसा मुख्यतः उसकी उस विचारहीन नीति का परिणाम था जिसने उसको तो नुकसान पहुंचाया ही पर किसी और देश का भला भी नहीं किया। इसलिए संयुक्त राज्य ही अकेला देश रह गया था जिसने चांदी का समर्थन किया।
सोने के प्रति इस पूर्वाग्रह से ग्रस्त प्रायः प्रत्येक सरकार की तरह ही उसके लिए भी यह एक अनुन्मूलनीय पूर्वाग्रह नहीं था। देश यही चहते थे कि कोई प्रभावशाली राष्ट्र इसी पहल करें। इन सम्मेलनों के पूरे वादविवाद में एक बात बिल्कुल साफतौर पर दिखाई दी। यदि इंग्लैंड द्विधातुक प्रणाली को अपना सकता तो दूसरे देश भी भेड़ों की तरह उसका अनुसरण करते। परन्तु वह अपनी प्रणाली के प्रति इतना अधिक समर्पित था कि वह उसमें कोई परिवर्तन नहीं कर सकता था। इसका परिणाम यह हुआ कि द्विधातुवाद जो मुद्रा की कठिनाइयों से उबरने का एक मार्ग था, एक निर्जीव परियोजना बनकर रह गया। उसकी हठधर्मी के कारण द्विधातुक प्रणाली को पुनः स्थापित करने की संभावना लुप्त होने का मामला यूरोप के देशों के लिए एक छोटी सी बात थी। उन्होंने वास्तव में सोने का जो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा का स्वरूप था उसे मुद्रा
मनी एंड मैकेनिज्म ऑफ एक्सचेंज 1890 पृ.143
1881 के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि मंडल की रिपोर्ट 1882 की सी 3229 पृ. 7
रसेल ऑफ सिट पृ. 374-5 थी।