स्वर्ण मानक की ओर
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का आधार बना लिया था और इसलिए वे इस मामले के प्रति बिल्कुल उदासीन रहे, परंतु भारत की आशाओं पर यह एक भारी कुठाराघात था। 1878 ई. के प्रस्ताव के गिर जाने के बाद, भारत सरकार ने द्विधातुवाद को उसका उपचार माना और उसके आगमन से यह आशा की कि उससे कठिनाइयों से मुक्ति मिल जाएगी। यह सच है कि द्विधातुवाद के संबंध में विचार-विमर्श के प्रारंभ में भारत सरकार का दृष्टिकोण कुछ ढीला-ढाला रहा। 10 जून, 1881 को सैक्रेटरी ऑफ स्टेट को प्रेषित एक पत्र में ख्1, यह स्पष्ट किया गया कि द्विधातुवाद के संबंध में तत्कालीन सरकार का द्विधातुवाद के लाभ के विषय में मतभेद है। वायसराय तथा कौंसिल के एक अन्य सदस्य ने अपना समर्थन देने से इस आधार पर इनकार कर दिया था कि सिद्धांत रूप में द्वि धातुवाद गलत है ख्2, और यहां तक कि जिन अधिकांश लोगों का प्रश्न के इस पहलू पर अलग विचार था, वे भी उस समय एक द्विधातुक संघ में शामिल होने के लिए तैयार नहीं थे। यद्यपि अन्य सरकारें काफी संख्या में इसमें शामिल होने को तैयार थीं तो उन्हें ऐसा करने में कोई आपत्ति दिखाई नहीं देती थी। तथापि, उनकी वित्तीय कठिनाइयों के बढ़ने से द्विधातुवाद में यह अल्प विश्वास अत्यधिक गहरा हो गया, इतना गहरा हो गया कि 1886 में सरकार ने सैक्रेटरी ऑफ स्टेट को एक पत्र भेजा ख्3, जिसमें उसने सोने तथा चांदी के बीच एक स्थिर अनुपात स्थापित करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा सम्मेलन बुलाने में पहल करने का आग्रह किया गया। द्विधातुवाद के निष्पादन में उसकी इतनी गहन रुचि थी कि उसने उस समय ट्रेजरी की तीव्र भर्त्सना करने में हिचकिचाहट नहीं कि जब उन्होंने सैक्रेटरी ऑफ स्टेट द्वारा उनको विचारार्थ भेजे गए सुझाव को उसने नकार दिया था। ख्4, विश्वास तथा आशा की ऐसी भावना के साथ भारत सरकार ने इन अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में प्रवेश किया और वहां अपने भाग्य को देखती रही। परन्तु भारत सरकार के साथ जिस प्रकार का संदेहपूर्ण तथा अन्यायपूर्ण व्यवहार किया गया, ऐसा व्यवहार किसी अन्य सरकार के साथ नहीं किया जा सकता था। कोई भी शक्तिशाली देश यहां तक कि इंग्ल्ैंड भी यह नहीं चाहता था कि भारत सरकार द्विधातुक संघ में प्रवेश करें। ख्5, भारत सरकार के साथ एक खलनायक जैसा व्यवहार किया गया जैसे कि उसका प्रस्तुतीकरण और कुछ नहीं केवल सोने के पहले से क्षीयमान भंडार पर झपटने की युक्तियां हों। भारत को केवल द्विधातुक संघ से बाहर रखने की ही योजना नहीं बनाई गई थी, बल्कि भारत से यह
1882 का पीपीसी 3229 पृ.33
वही पृ.37
दिनांक 2 फरवरी, 1886 देखिए 1886 का सी 4868 पृ.5
4 सितम्बर, 1886 का पत्र। स्वर्ण तथा रजत पर रॉयल कमीशन 1886 की प्रथम रिपोर्ट का
परिशिष्ट-2
- स्वर्ण तथा रजत आयोग, 1886 के समक्ष, श्री स्मिथ की साक्षी प्र. 4825-30 श्री वाटनी की भी साक्षी
प्र.9427