152 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
भी अपेक्षा की गई थी कि सोने को विधिमान्य मुद्रा ख्1, बनाकर एक स्थिर अनुपात को स्थापित करने के अपने प्रयास में सफलता प्राप्त करने के बाद वह संघ के माध्यम से अपनी गैर-जिम्मेदाराना कार्यवाही से लाभ उठाने का वचन दे। भारत सरकार ने ये सब गारंटी द्विधातुवाद के उद्देश्य के प्रति एक कारूणिक निष्ठा में दी थी क्योंकि द्वि धातुवाद की सफलता पर वह बहुत अधिक निर्भर थी। इसके फलस्वरूप, जब प्रयास असफल हो गया तो भारत सरकार को इससे जो निराशा हुई उसने उसका दिल तोड़ दिया। यह बात कहने में कोई कठोरता नहीं है कि इस निराशा को उत्पन्न करने में ब्रिटिश प्राधिकारियों ने जो भूमिका अदा की थी वह अत्यंत गैर-जिम्मेदाराना थीµजिसे दुष्टतापूर्ण भी कहा जा सकता है। उन्होंने भारत पर उसकी घोषित इच्छा के विपरीत दबाव डाला कि भारत रजतमान को बनाए रखे। उसने ऐसा आंशिक रूप में इसलिए किया की वह सोने के लिए किसी प्रकार की मांग न करने और आंशिक रूप से वह अन्य राष्ट्रों को इस बात की आलोचना करने से चुप करना चाहता था कि ब्रिटेन चांदी को ख्2, पुनर्व्यवस्थित करने के मामले में अपना हिस्सा नहीं ले रहा है। यही केवल मात्र लाभ नहीं था जो आज्ञापालन करने के लिए बाध्य देश से वसूल करना था। एक ओर इसने भारत सरकार को मुद्रा के सुधार के मामले में स्वतंत्र कार्रवाई करने से रोका और दूसरी ओर उस क्षति व हानि को जो अवमूल्यन वाली मुद्रा के कारण हुई थी, पूरा करने के लिए उपयुक्त अन्य ऐसे साधनों की संसदीय निंदा के अंतर्गत कर दिया। हाउस ऑफ कामन्स के दो बार प्रस्ताव पेश कर प्रेरित किया गया, एक बार 1877 में और फिर 1879 में। प्रस्ताव में कहा गया कि यदि भारत सरकार प्रकट रूप में अपनी शुल्क दर कम करे, मुक्त व्यापार के हित में परन्तु वास्तविक रूप में, ऐसा लंकाशायर की बिगड़ी दिशा को राहत पहुंचाने के लिए था। इसका परिणाम यह हुआ कि सरकार अपने सबसे अधिक संकट के समय में अपने राजस्व के एक महत्वपूर्ण स्रोत को काम में नहीं ला सकी। केवल एक मात्र पर्याप्त क्षतिपूर्ति ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा एक सरकार को जो इस प्रकार पूर्णरूप से उनकी आज्ञा अशक्त हो गई थी और जिसके हित में उन्होंने कानूनी ट्रस्टी होने का बहुत जोर से दावा किया था, की जा सकती थी, वह यह थी कि वे द्विधातु संघ में शामिल होने के लिए अपनी सहमति दे देते इसका निष्पादन केवल उनकी दया पर निर्भर था। परंतु जैसा कि सुविदित है कि उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया जिससे प्रवर्तित प्रतीक्षा की अवधि के बाद और अपरिहार्य कष्ट के निवारण के कोई साधन न होने से, भारत सरकार ने 1893 के अंत में स्वयं को वहीं पाया जहां पर वह 1878 के प्रारंभ में थी।
सहजबुद्धि वाले सभी लोगों की भांति जो प्रार्थना करते है और साथ ही साथ अपना बारूद भी सूखा रखते हैं, संयुक्त राज्य अमरीका को छोड़कर चांदी के अधीन
भारतीय प्रतिनिधियों की रिपोर्ट पृ.12
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा सम्मेलन, 1878 में श्री गोशेन का भाषण तृतीय अधिवेशन, अमरीकी प्रतिनिधियों की रिपोर्ट,
सीनेट एक्जीक्युटिव प्रलेख, सं. 58, 45वीं कांग्रेस, तृतीय अधिवेशन, वाशिंगटन, 1879 पृ.50-52