स्वर्ण मानक की ओर
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सभी देशों ने इस अंतराल का उपयोग अपने सोने के आधार को सुदृढ़ करने में किया। यह कार्य उन्होंने चांदी प्रयोग को बढ़ाने ख्1, संबंधी मनोरंजक योजना पर मुद्रा सम्मेलनों के विचार-विमर्श में भाग लेकर किया। 1878 के सम्मेलन में श्री गोशेन ने बिल्कुल दार्शनिक अंदाज में यह कहा था कि संयुक्त राज्य अमरीका चांदी को उसके अवमूल्यन के कारण प्रयोग करने से डरता था और अवमूल्यन इसलिए जारी था क्योंकि संयुक्त राज्य उसका प्रयोग करने से डरता था। अब यदि इस निदान का प्रथम भाग सही होता तो हम यह देखते कि संयुक्त राज्य अमरीका उस समय चांदी को पुनः स्थापित करने व उसकी स्थिति को सुधारने में गंभीरतापूर्वक लगता, जब संयुक्त राज्य अमरीका के चांदी संबंधी कानून द्वारा उसकी कीमत को सहारा दिया गया था। उसके विपरीत, जहां तक चांदी की मासिक खरीद का प्रश्न है, 1878 के ब्लैंड एलिसन एक्ट, या 1890 के शेरमन एक्ट के अंतर्गत, उसने चांदी की कीमत को रोके रखा। वे उसको पुनः उसकी पूर्व स्थिति पर न लाने के लिए कदम उठाने को केवल उत्सुकता महसूस नहीं कर रहे थे बल्कि उन्होंने वास्तव में, इस वृद्धि का लाभ उसको निकालने में उठाया। ख्2, उनको किसी बात के लिए दोष देना संभव नहीं क्योंकि एक द्विधातुक संघ के हवा में गायब होने की संभावना के साथ-साथ इस महाभार का संचय व ढेर भी इस निराधार लज्जाजनक स्थिति में समाप्त हो गया होता। अकेले भारत ने इस दबाव से लाभ उठाने से मना कर दिया, जिसे संयुक्त राज्य अमेरिका ने अन्य राष्ट्रों के लिए स्थानापन्न रूप में लिया और मूल्यवान समय को निकलने दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि इसे उसी उपाय के लिए वापिस वहां भेज दिया, जिस उपाय को अपनाने से 1878 में इनकार कर दिया गया था।
यदि उसे स्वर्णमान वाला होना ही था तो बेहतर होता यदि उसे 1878 में किया ही जाता। इसमें संदेह नहीं, कि भारत सरकार ने उस समय जिस योजना की रूपरेखा प्रस्तुत की थी वह इतनी अधिक जटिल तथा इतनी अधिक सारहीन थी कि वह व्यवहार्य नहीं हो सकती थी। परन्तु उसे अस्वीकार कर देने से स्वर्णमान के प्रवेश को बिल्कुल ही निलम्बित नहीं कर देना चाहिए था। यदि उसे अंग्रेजी नमूने पर रूढि़वादी प्रकार का होना था तो इसमें संदेह नहीं कि उसमें सरकार को कुछ खर्च करना पड़ता। इस खर्च के लिए देश के चांदी के भंडार के एक भाग को घटे हुए मूल्य पर बेचने के लिए बाध्य होना पड़ता जिससे रुपये को एक सहायक स्थिति प्रदान की जा सके और उसके रिक्त स्थान की पूर्ति स्वर्ण मुद्रा से की जा सके। इस परिवर्तन का खर्च 1878 में नगण्य होता, क्योंकि उस समय चांदी में गिरावट, उसके सामान्य
- सम्मेलनों में सुझाई गई अनेक प्रकार की योजनाओं के लिए 1892 के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा सम्मेलन, वाशिंगटन,
1893 को अमरीकी प्रतिनिधियों की रिपोर्ट।
- रसल ओपी पृ.410 पोलिटिकल इकोनोमी जर्नल (शिकागो) खंड 1 पृष्ठ 174 में प्रो. ढफ ए.वाकर का
लेख ‘‘दि फ्री कोयनैज ऑफ सिल्वर’’ भी।