4. स्वर्ण मानक की ओर - Page 169

154 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

स्वर्ण मूल्य से केवल 12 ½ प्रतिशत थी। इसके विपरीत यदि वह कर्नल स्मिथ की जैसी रूढि विरुद्ध योजना पर होता तो उसमें सरकार को उससे अधिक कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता ख्1, जो टकसाल में सोने के सिक्के बनाने के लिए नई मशीनरी लगाने में खर्च हुआ। परन्तु 1893 में, स्वर्णमान को समादित करने वाली ये दोनों प्रक्रियाएं निराशाजनक प्रतीत हुईं। परिवर्तन की योजना की असंभावना का बिल्कुल कोई प्रश्न नहीं था। 1893 में चांदी के मूल्य में गिरावट लगभग 35 प्रतिशत थी। यहां तक कि स्मिथ योजना का भविष्य भी देश में मुद्रा के प्रचलन में रुपये की भारी मात्रा शामिल हो जाने के कारण अधिक उज्जवल प्रतीत नहीं होता था। यदि इसे 1878 में अपना लिया जाता तो उसके बाद मुद्रा में शामिल होने वाली मुद्राएं सोने की होतीं इसका परिणाम यह होता कि 1893 तक चांदी से सोने का अनुपात बहुत अधिक होता जिससे समूची मुद्रा प्रणाली विशुद्ध सोने के आधार वाले देशों से संबंधित वांछित स्थिरता से सम्पन्न होती। 1893 में चांदी की मुद्रा का भंडार अत्यधिक अनुपात में बढ़ गया था, जिससे यह निश्चित दिखाई दिया कि चांदी के सिक्कों को बंद करके रुपये को मुद्रा का एक स्थिर तथा सुरक्षित रूप बनाने में कई दशक लगेंगे।

इस प्रकार की बंद गली से बाहर मार्क दिखाने वाली योजनाएं अनेकों थीं। एक अधिक भारी रुपया बनाने का था ख्2, दूसरा चांदी सीमित विधिमान्य मुद्रा तथा सैक्रेटरी ऑफ स्टेट को इस बात के लिए प्राधिकृत करना था कि वह सोने या चांदी के भारतीय भंडार को अपने सोने के भुगतान की सीमा तक लंदन में बेच दे। जिनका

  1. यह मामला इतना स्पष्ट है कि लंदन टाइम्स यद्यपि इस बात से सहमत नहीं था कि उस समय किसी

परिवर्तन की तत्काल आवश्यकता थी फिर भी उसने 25 अक्तूबर 1876 (पृ.9 कालम 2) के अपने

अंश में प्रमुख लेख में यह कहा, ‘‘गवर्नर जनरल इन कौंसिल स्वर्णमान के सुझाव को इस आधार पर

अस्वीकार करता है कि चूंकि वर्तमान स्थिति खराब है अतः इस स्थिति में ऐसे महंगे उपाय व उपचार

की आवश्यकता नहीं है, परन्तु इसमें प्रस्ताव की भ्रमित धारणा निहित है। भारत में रजत मुद्रा के स्थान

पर स्वर्ण मुद्रा का लाना एक सबसे व्यापक तथा अत्यंत महंगा कार्य होगा, परन्तु सब आगन्तुकों के लिए

चांदी के सिक्के बनाने से मना करने और स्वर्ण के सिक्के बनाने के लिए प्रस्तुत रहने से नई मशीनों

पर आने वाले खर्च के अलावा कई खर्च नहीं होगा। यदि यह घोषणा कर दी जाती कि एक निश्चित

या अमुक दिन के बाद चांदी का सिक्का बनाना बंद कर दिया जाएगा और उसके बजाए उनके लिए

सोने का सिक्का बना दिया जाएगा जो सोना लाएंगे। जो सिक्के एक निश्चित दर पर रुपये के लिए

परिवर्तनीय होंगे, उनके भारत में द्विधातुक प्रणाली की शुरुआत की जाएगी जो फ्रांस में विद्यमान हैं और

मुद्रा में परिवर्तन धीरे-धीरे शुरू किया जाएगा। पहले कुछ भी सोना सिक्के बनाने के लिए नहीं लाया

जाएगा, परन्तु जैसे ही चांदी के सिक्के बनाने को स्थगित किया जाएगा, जिससे विद्यमान रुपये के मूल्य

में रुपये तथा सोने के परिवर्तन की निश्चित दर द्वारा परिभाषित अंकित मूल्य से वृद्धि होगी, वैसे ही

अधिक से अधिक सोना टकसाल में लाया जाएगा और वह प्रचलन/वितरण में आ जाएगा। यह प्रक्रिया

स्वयं चालित होगी और महंगी नहीं होगी, परंतु यह अत्यंत धीमी गति से होगी। 2. आस्टन द्वारा और आर.वेस्ट द्वारा भी आई सी सी 1893 परिशिष्ट 3 पृ.281 तथा 325