स्वर्ण मानक की ओर
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भुगतान भारत सरकार द्वारा ‘‘बौन’’ ख्1, नामक वैध मुद्रा नोटों को असीमित संख्या में जारी करके किया जाना है। तीसरा यह था कि इंग्लैंड तथा भारत को अपने बीच एक नए आधार पर एक द्विधातुक मान अपनाना चाहिए ख्2, अथवा रुपये की इंग्लैंड ख्3, में पूर्ण वैध मुद्रा स्वीकार कर लिया जाना चाहिए। चौथा, सिक्के ढलाई के लिए टकसालों के खोलने तथा बंद करने को नियमित करना था। यह कार्य सैक्रेटरी ऑफ स्टेट के कौंसिल ड्राफट के लिए प्रतिवर्ष के प्रारंभ में निर्धारित किए गए विनिमय की दर से वास्तविक विनिमय दरों के परिवर्तन के आधार पर करना था। इस योजना के अंतर्गत जब तक वास्तविक दर में निर्धारित दर से 5 प्रतिशत तक की वृद्धि न हो जाए तब तक चांदी के मुक्त सिक्का निर्माण को स्थगित रखा जाना था। ख्4, पांचवा, इस प्रकार की व्यवस्था करनी थी कि एक ओर सैक्रेटरी ऑफ स्टेट को अपने ड्राफट की न्यूनतम दर निर्धारित करनी चाहिए और दूसरी ओर भारत सरकार को चांदी के समस्त आयात पर शुल्क उगाहना चाहिए। यह शुल्क लंदन में चांदी की सिल्ली की दैनिक सरकारी दरों तथा कौंसिल ड्राफटस ख्5, (हुंडी) के लिए निर्धारित दर के अनुरूप चांदी के मूल्य के बीच अंतर के बराबर होना चाहिए। छठा एक द्विधातुक सिक्के को शुरू करना था जिसका नाम शाही फलोरिन या रुपया था, इसका मूल्य 2 शिलिंग और इसके भार में 4 प्रतिशत सोना और शेष चांदी थी। ख्6, सातवां स्वर्ण तथा रजत के मुक्त मानों की स्थापना करना था जो उनके बीच विनिमय की किसी निर्धारित दर से रहित ख्7, या अधिक बड़े मूल्य वर्ग के लेनदेन व सौदों में सोने के प्रयोग के लिए थोड़ा प्रलोभन था। ख्8, यद्यपि भारत सरकार मुद्रा सुधार की इन योजनाओं से जो यदि सनक नहीं, तो चतुराई से मारी हुई थी, सहमत नहीं थी। वह उनकी दृष्टि में जो लक्ष्य था अर्थात् प्रचलन में विद्यमान रुपये के स्थान पर सोने के वास्तविक प्रयोग को शामिल किए बिना, भारत को स्वर्ण के आधार पर रखना था। इस लक्ष्य को दृष्टि में रखकर इसने कर्नल ‘‘स्मिथ की अपेक्षाकृत अधिक सरल तथा अधिक वैज्ञानिक योजना को पुनः अपनाने के लिए माना। प्रारंभिक तैयारी के रूप में, सरकार बंगाल चैम्बर ऑफ कॉमर्स (बंगला वाणिज्य बैंक) के प्रस्ताव की नीति पर लौट आई। इस नीति संबंधी प्रस्ताव को अपनाने पर 1876 में ‘‘घोर आपत्ति’’ की गई थी। 21 जून, 1892 की विज्ञप्ति में जिसमें ये प्रस्ताव थे भारत सरकार ने और किसी बात की मांग नहीं की। उनके रचनाकारों के शब्दों में उन्होंने यह प्रस्ताव रखा ख्9, ःµ
अटकिन्सµ द्वारा, वही पृ. 282
चेयमैनµ द्वारा, वही पृष्ठ 282,
बुड़हाउसµ द्वारा, वही पृ.33
ग्राहमµ द्वारा, पृष्ठ 305
एम.शिलिजिµ द्वारा, वही पृ.319
स्टाकार्टµ पृ.322 इसी प्रकार का एक और लेख मैरिगठन द्वारा भी पृ.316
पेरीµद्वारा वही पृ.323
क्लेरेन्थ डेनियलµ द्वारा, वही पृष्ठ 292
सर डेविड बार्बर दि स्टैंडर्ड ऑफ वैल्यू, 912 पृष्ठ 203-3