स्वर्ण मानक की ओर
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दातव्यों की संतुष्टि पर प्राप्त किया जाएगा’’। ख्1, इन सिफारिशों को 26 जून, 1893 को प्रभावी (लागू) किया गया है। भारतीय मुद्रा के इतिहास में वर्ष 1835 में घटी एक युगान्तरकारी घटना है। उस तारीख को एक विधायी अधिनियम तथा तीन कार्यकारी अधिसूचनाएं साथ-साथ जारी की गइंर्, ताकि जो उद्देश्य सामने था, उसे पूरा किया जा सके। 1893 का अधिनियम (8) केवल एक निरस्त करने वाला अधिनियम था। इसने निम्नलिखित को निरस्त कियाµ
(1) भारतीय सिक्का अधिनियम 23, 1870 धारा 19 से 26 (दोनों शामिल) जिनके अनुसार टकसालों के स्वामियों के लिए यह आवश्यक था कि वे अपनी टकसालों में सिक्के ढालने के लिए लाई गई सभी चांदी के सिक्के बनाएं।’’ ख्2,
(2) भारतीय कागजी मुद्रा, 1882 ख्3,
(क) धारा 11, अनुच्छेद (ख) जिसके अनुसार कागजी मुद्रा विभाग के लिए यह
आवश्यकता था कि वह पुर्तगाली कन्वेंशन एक्ट, 1881 के अधीन निर्मित
चांदी के सिक्कों के बदले नोट जारी करें। ख्4,
(ख) धारा 11, अनुच्छेद (ख)। इसके अनुसार कागजी मुद्रा विभाग के लिए
यह आवश्यक था कि वह सिल्वर बुलियन या विदेशी चांदी के सिक्के के
बदले नोट जारी करें। ख्5,
(ग) धारा 13 इसका केवल वह प्रावधान जो कागजी मुद्रा निधि के स्वर्ण भाग
को कुल निधि के एक चौथाई भाग तक सीमित करता था। ख्6,
अधिनियम द्वारा इन निरसनों की एक कार्यकारी अधिसूचना सं. 2663 द्वारा समर्थन प्राप्त हुआ। जिसमें हर्शल समिति के इस सुझाव की पुष्टि करते हुए यह घोषणा की
रिपोर्ट पैराµ156
इन धाराओं में यह भी व्यवस्था थी कि टकसालों में सिक्के बनाने के लिए निजी (प्राइवेट) व्यक्तियों द्व
ारा लाए गए सब सोने के सिक्के बनाए जाएं। टकसाल में लाई गई मात्रा बिल्कुल नगण्य होती थी और
सोने के सिक्के अर्थात् मोहरें वैध मुद्रा नहीं थी क्योंकि उनका स्थान सॉवरेन को लेना था जिनका खुला
निर्माण बाद में टकसालों में सोने के मुक्त सिक्का ढलाई के लिए होता था, अतः ऐसी और अधिक
मोहरों के सिक्के बनाना अवांछनीय समझा गया । इसके फलस्वरूप टकसालों को चांदी के साथ-साथ
सोने के लिए भी बंद कर दिया गया।
- अधिनियम की इन धाराओं का निरसन अन्य धाराओं को निरस्त करने के लिए भी आवश्यक हो गया,
जैसा धारा 14 तथा धारा 15 तथा धारा 21 एवं 28 में परिवर्तन, जिससे समूचे अधिनियम को, उस
समय उद्घाटित स्वर्णमान की नीति के अनुसार लाया जा सके।
यह प्रथा समाप्त हो गई थी, और इसलिए इस अनुच्छेद धारा को बनाए रखना अनावश्यक था।
इस अनुच्छेद को टकसालों के बंद करने के बाद बनाए रखना असंगत था।
सोने को भारत का भावी मानक होना था, इसलिए यह सीमा रखना आवश्यक नहीं था।