158 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गई कि सरकारी खजाने सार्वजनिक शुल्कों के भुगतान से चालू भार वाले सॉवरेन तथा अर्धसॉवरेन, क्रमशः 15 रुपये तथा 7 रुपये आठ आने की दर पर प्राप्त करेंगे।
चूंकि सोने को उपर्युक्त किसी उपाय द्वारा वैध मुद्रा नहीं बनाया गया था, अतः यह डर था कि खजानों में एक ऐसी स्टाक मुद्रा के संचित होने से सरकार परेशानी में पड़ सकती है जिसका भुगतान वह अपने दायित्वों का निर्वाह करने के लिए नहीं कर सकती थी। सरकार के खजानों को इतने सोने से छुटकारा दिलाने के लिए कि कहीं वह उनमें इस सीमा तक एकत्रित न हो जाए जो असुविधाजनक हो, एक दूसरी अधिसूचना सं. 2664 जारी की गई। जिसके अनुसार यह अपेक्षित था कि मुद्रा विभाग से महानियंत्रक की मांग पर सोने के सिक्कों या स्वर्ण बुलियन के बदले में मुद्रा के नोट जारी करे जिसकी दर 7.53344 ग्रा. शुद्ध सोने, के लिए एक सरकारी रुपया हो या एक सॉवरेन अथवा अर्धसॉवरेन की दर क्रमशः 15 रुपये तथा 7 रुपये आठ आना हो।
हर्शल समिति द्वारा प्रस्तुत द्वितीय संशोधन को लागू करने के लिए एक तीसरी अधिसूचना सं. 2662 जारी की गई जिसमें यह कहा गया किःµ
‘‘गवर्नर जनरल इन कौंसिल एतद्द्वारा घोषणा करते हैं कि अगले आदेशों तक सोने के सिक्के तथा सोना बुलियन क्रमशः कलकत्ता तथा बम्बई की टकसालों के स्वामियों द्वारा, सरकारी रुपये के बदले में, एक रुपये के लिए 7.53344 ग्रा. ट्राय शुद्ध स्वर्ण की दर पर निम्नलिखित शर्तों पर प्राप्त किए जाएंगेµ
ऐसे सिक्के या बुलियन, सिक्के बनाने के योग्य होने चाहिए।
इनकी एक बार दी गई मात्रा 50 तोले से कम नहीं होनी चाहिए।
पिघलाए या काटे जाने वाले समस्त स्वर्ण सिक्कों या बुलियन पर एक चौथाई
( ¼ ) प्रति मिली शुल्क लगाया जाएगा ताकि उसे टकसाल में प्राप्त करने के
योग्य बनाया जा सके।
- स्वर्ण के सिक्के या बुलियन को टकसाल में प्राप्त करने के बाद टकसाल मास्टर,
स्वामी को एक रसीद प्रदान करेंगे जो उसे टकसाल से तथा पारखियों से एक
प्रमाणपत्र का हकदार बनाएगी। यह प्रमाणपत्र रुपये की उस राशि के लिए होगा
जो उसे ऐसे सिक्कों या बुलियन के बदले में जनरल (रिजर्व) ट्रेजरी, कलकत्ता
या बम्बई में देय होगी। ऐसा प्रमाणपत्र, जनरल ट्रेजरी में उसके जारी होने से
उतने समय के गुजरने के बाद देय होगा जो समय-समय पर महानियंत्रक द्वारा
निर्धारित किया जाएगा।
इन उपायों द्वारा प्रस्तुत रूपरेखा की नीति को लागू करने से पहले, इसे समाप्त करने के लिए एक अभियान चल पड़ा। 1892 के अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा सम्मेलन की असफलता के बाद संयुक्त राज्य अमेरिका तथा फ्रांस दो देश चांदी के अधिमूल्य वाले भंडार