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स्वर्ण मानक की ओर

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के भारी बोझ से दबे हुए थे। उन्होंने ब्रिटिश सरकार के साथ समझौते की बातचीत के द्वार खोल दिए और ब्रिटिश सरकार को कुछ शर्तें मानने के लिए कहा जिसकी स्वीकृति पर उन्हें 15 ½ ः1 के अनुपात पर चांदी के सिक्कों का मुफत निर्माण करने के लिए अपनी टकसाल खोनी थी ख्1, इन शर्तों में से बातें शामिल थींःµ (1) उन भारतीय टकसालों को खोलना जिन्हें चांदी के सिक्कों की मुफत ढलाई के

लिए बंद कर दिया गया था तथा एक बचत पत्र देना कि भारत में सोने को

वैध मुद्रा नहीं बनाया जाएगा।

(2) चांदी में बैंक ऑफ इंग्लैंड के निर्गम विभाग में 1/5 बुलियन रखना। (3) (क) इंग्लैंड में चांदी की वैध मुद्रा की सीमा को 10 पाउंड तक बढ़ाना।

(ख) चांदी पर आधारित 20 शि. के नोट जारी करना जो वैध मुद्रा होगी।

(ग) 10 शिलिंग के स्वर्ण सिक्कों की धीमी गति से या अन्यथा समाप्ति और

उसके स्थान पर चांदी पर आधारित कागजी मुद्रा का प्रचलन। (4) प्रतिवर्ष चांदी की एक निश्चित मात्रा के सिक्के बनाने के लिए करार। (5) रुपये के सिक्के बनाने के लिए तथा ब्रिटिश डालरों के सिक्के बनाने के लिए

इंग्लिश टकसालों का खोलना। जो जलडमरू मध्य के उपनिवेश तथा रजतमान

के अन्य उपनिवेशों में पूर्ण वैध मुद्रा होंगे और चांदी को विधिमान्य मुद्रा की

सीमा तक ब्रिटेन में वैध होंगे।

(6) औपनिवेशिक कार्रवाई तथा मिश्र में चांदी की सिक्का ढलाई। (7) हस्किसन योजना के सामान्य क्षेत्र वाले कुछ अन्य मामले।

इन वार्ताओं में ट्रेजरी ने पुनः अपना पुराना रुख अपना लिया। उसने उन शर्तों पर चर्चा करने से इनकार कर दिया जो ब्रिटिश मुद्रा में परिवर्तन लाना चाहती थी। परंतु उसने यह तर्क दिया कि यदि भारतीय टकसालों को खोला गया तो इस कार्य को ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा स्वर्ण तथा रजत के बीच विनिमय की एक स्थिर मुद्रा के अंकित मूल्य को प्राप्त करने के उद्देश्य से किसी अंतर्राष्ट्रीय समझौते की दिशा में किया जाने वाला एक समुचित योगदान माना जाना चाहिए। ख्2, ऐसा प्रतीत हुआ कि संयुक्त राज्य अमेरिका तथा फ्रांस के प्रतिनिधि उस विचार से सहमत थे। तथापि, वार्ता असफल हो गई इसके असफल होने का कारण भारत सरकार द्वारा अपनाया गया दृढ़ रुख था। सरकार ने इतने अधिक लम्बे समय तक नुकसान उठाया था कि वह ट्रेजरी का बलि का बकरा बन गई। उसे ऐसा कोई कारण भी दिखाई नहीं दिया कि उसे फ्रांस तथा

  1. मुद्रा से संबंधित प्रस्तावों के संबंध में संयुक्त राज्य अमेरिका के विशेष दूतों द्वारा पत्र व्यवहार 1897

का पी.पी.सी.8667 पृष्ठ-3

  1. विदेश कार्यालय का दिनांक 16 अक्तूबर, 1897 का पत्र 1897 का पी.पी.सी. 8667 पृष्ठ-15