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स्वर्ण मानक की ओर

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गिरेगा। फिर हम चांदी के मूल्य में उतार-चढ़ाव के साथ मूल्य के अपने मानक के विनिमय मूल्य के उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए क्या प्रक्रिया या मार्ग अपना सकते हैं? हम यह नहीं सोचते कि हमारे सामने कोई उपाय खुला होगा क्योंकि यदि भारतीय टकसालों को अब चांदी के लिए पुनः खोल दिया गया तो भारत सरकार के लिए इन्हें पुनः बंद करना वास्तव में असंभव होगा और यदि उन्हें बंद कर भी दिया गया तो यह तभी होगा जब प्रचलन में चांदी की राशि में बहुत अधिक वृद्धि हो जाएगी।

परंतु जैसे ही उसने अपने समक्ष प्रस्तुत अपने लक्ष्य अर्थात् स्वर्णमान की शुरुआत से घटने से इनकार किया, जैसे ही उसके शीघ्र बाद उसने सामने उसकी वर्तमान मुद्रा व्यवस्था में एक कठिन समस्या आ खड़ी हुई। रुपये का भंडार जिसमें टकसालों के बंद होने के कारण 1893 से वृद्धि नहीं हुई थी, इतना विशाल था कि वह यथेष्ट समय तक लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए पर्याप्त था। बंद होने से पहले कुछ वर्षों में रुपये की मुद्रा केवल प्रचुर मात्रा में ही नहीं थी, बल्कि यह फालतू भी थी। शीघ्र ही यह फालतू नहीं रही और वास्तव में 1898 के आखिर तक वह इतनी अधिक दुर्लभ हो गई कि भारतीय मुद्रा बाजार में बट्टे व छूट की दर बढ़कर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई और वह वर्ष के अधिकांश भाग में इसी अवस्था में जारी रही। मुद्रा के लिए तरसाने की इस नीति के विरुद्ध इतना हो हल्ला हुआ कि सरकार को बाध्य होकर 1898 में एक अधिनियम (सं.11) पारित करना पड़ा। इसके अनुसार, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को लंदन में दिए गए सोने के विरुद्ध भारत में मुद्रा के नोटों को जारी करने की अनुमति दी गई। इस अधिनियम ने उस समय भारतीय मुद्रा बाजार की अभावग्रस्त स्थिति को दोहरा लाभ पहुंचाया। 1893 में अपनाए गए उपायों के अनुसार सोना एक सामान्य वैध मुद्रा नहीं था। अतः जब रुपये की मुद्रा आवश्यकता से कम पड़ गई तो उसका प्रयोग नहीं किया जा सकता था। यह सही है, कि नए अधिनियम ने सोने को वैध मुद्रा नहीं बनाया था, परंतु इस अधिनियम ने इसको आम जनता ख्1, की ओर से मुद्रा नोटों को जारी करने के लिए एक सहारे के रूप में प्रयोग करने की अनुमति दे दी थी। वे मुद्रा नोट वैध मुद्रा थे। तथापि, अधिनियम में यह अपेक्षित हो सकता था कि नोटों को जारी करने से पहले भारत में सोने को रखा जाए। क्योंकि भारत में सोने के प्रेषण में लगभग तीन या चार सप्ताह का समय लग गया। अतः यह भय व आशंका हुई ख्2, कि यह उपाय इतना अधिक धीमा व ढीला सिद्ध हो सकता है कि वह उस समय तक प्रभावी नहीं हो सकता था जब तक उस अंतराल को यह व्यवस्था करके समाप्त न कर दिया जाता कि लंदन में सेक्रेटरी ऑफ स्टेट के पास जो सोना था, वह नोट को जारी करने के लिए कागजी मुद्रा विभाग के पास सोना होने के समान ही है। अर्थात् उस सोने को मुद्रा विभाग के पास विद्यमान होने के समान ही मान लिया जाए।

  1. 1893 की अधिसूचना सं. 2664 के अनुसार नोट महानियंत्रक को केवल सोने के विरुद्ध जारी किए जा

सकते थे।

  1. विधेयक को प्रस्तुत करते समय माननीय सर जेम्स वैस्टलैंड का भाषण दिनांक 14 जनवरी, 1898