4. स्वर्ण मानक की ओर - Page 177

162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ऐसा करके अधिनियम ने परिस्थिति की आवश्यकता को केवल प्रमाणित किया। एक स्वस्थ मुद्रा प्रणाली में प्रसार तथा संकुचन की क्षमता होनी चाहिए। सरकार ने 1893 में टकसालों को बंद करके मुद्रा को इतना अधिक संकुचित कर दिया था कि उससे खतरा उत्पन्न हो गया था। 1898 में ऐसे उपाय शुरू करने की आवश्यकता पड़ी जिनसे उसका प्रसार किया जा सके। अब इस वांछित परिणाम को प्राप्त करने के लिए दो तरीके थे। एक टकसालों को बंद करना और सॉवरेन को सामान्य वैध मुद्रा बनाकर सोने के प्रयोग द्वारा मुद्रा में वृद्धि करने की अनुमति देना था। भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित यही योजना थी। अपने दिनांक 8 मार्च 1998 के पत्र में उन्होंने यह तर्क दिया। ख्1, ‘‘हमारी मंशा इस समय, व्यापार के स्वचालित प्रक्रिया में विश्वास करना है। वाणिज्य की आवश्यकताओं के लिए जितने सिक्के अपेक्षित हैं उनकी राशि में प्रतिवर्ष वृद्धि होती है और चूंकि हम चांदी के सिक्कों को बढ़ाकर मुद्रित नहीं करते अतः हम युक्तिसंगत रूप में यह आशा कर सकते हैं कि सिक्कों के लिए बढ़ती हुई मांग का प्रभाव विनिमय को एक ऐसे बिन्दु तक पहुंचा देगा जिस पर देश में सोने का प्रवाह होगा और वह प्रचलन में रहेगा। और इस प्रकार जैसे-जैसे समय गुजरेगा वैसे स्थिति और अधिक मजबूत होती जाएगी। परंतु कम से कम प्रारंभ में सोने का प्रचलन देश में विनिमय की स्थिरता को प्राप्त करने के लिए आवश्यक सीमा से अधिक नहीं होगा। प्रचलन अधिकांश चांदी का ही होगा और उसे एक मूल्यांकित मूल्य पर बनाए रखा जाएगा। (ठीक जैसा इस समय है) और हम यह देखकर संतोष कर सकते हैं कि सोने के सिक्के सीमा से थोड़ा अधिक प्रचलन में बने हुए हैं और इसका कारण यह है कि देश के बाहर इसके प्रेषण से देश में सिक्के का अभाव उत्पन्न हो सकता है, जिसका प्रभाव चांदी के रुपये के विनिमय मूल्य को बढ़ाने पर इस तरीके से पड़ेगा कि वह वापिस आ जाएगी अथवा अधिक से अधिक उससे बाहर की ओर प्रेषण का प्रवाह रुक जाएगा। हम उन स्थितियों में स्वर्णमान को प्राप्त कर लेते जो फ्रांस में विद्यमान स्थिति से भिन्न नहीं थी, यद्यपि इंगलिश अर्थों में वह सोने का वितरण प्रचलन न होता और संभवतः और बाद में यह बिल्कुल भी आवश्यक न हो।’’

सोने के प्रयोग द्वारा मुद्रा का प्रसार करने के अलावा, उसी उद्देश्य को लागू करने का एक और तरीका भी था। यह कहा गया कि मुद्रा की यह वृद्धि अतिरिक्त मुद्रा के लिए जब भी आवश्यकता पड़े तभी सरकार द्वारा रुपये के सिक्के बनाने से भी हो सकती है। यद्यपि टकसालें बंद कर दी गई थी, परंतु सरकार ने अधिसूचना सं. 2662 द्वारा यह शुरू कर दिया था कि वह प्रत्येक इच्छुक व्यक्ति को प्रति रुपया 7.53344 ग्रा. टाय शुद्ध सोने की दर से रुपया प्रदान करने का वचन दिया था। ख्2, मुद्रा

  1. भारत सरकार द्वारा मुद्रा संबंधी प्रस्तावों के विषय में पत्राचार 1898 की पत्रा. 1898 पृ.3
  2. देखिए सुप्ता