स्वर्ण मानक की ओर
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को किसी भी वांछित सीमा तक बढ़ाने के लिए सरकार को उस अधिसूचना को लागू करना था। मुद्रा का प्रसार करने की इस योजना के प्रमुख समर्थक श्री प्रोबीन तथा श्री ए.एस.लिंडसे थे। दोनों ने यह दावा किया कि भारत सरकार की योजना दोषपूर्ण है क्योंकि यद्यपि उसने सोने को वैध मुद्रा बनाकर मुद्रा के प्रसार की व्यवस्था की है परन्तु उसने रुपये को पूर्णतया अपरिवर्तनीय बना दिया है और उससे उसके विनिमय मूल्य को स्थिर करने की नीति के परास्त होने की संभावना है। इसके विपरीत उन्होंने भारत सरकार की योजना से अपनी योजना को श्रेष्ठ माना, क्योंकि उन्होंने इस जिम्मेदारी व बाध्यता को रुपये की मुद्रा को कुछ शर्तों पर परिवर्तित करने की व्यवस्था करने के लिए मान्यता दी। यद्यपि उन दोनों की योजनाओं में एक प्रकार की परिवर्तनशीलता विनिमेयता अपेक्षित थी, फिर भी उनके वे विशेष तरीके वास्तव में अलग-अलग थे जिनमें विनिमय को लागू करना था। श्री प्रोबीन ने यह प्रस्ताव किया ख्1, µ
- कि 1893 की अधिसूचना को कानूनी प्रभाव दिया जाना चाहिए, जिसके अधीन
जनता रुपये को, सोने के बदले 1शि. 4 पें (1 एस 4 डी)की दर पर भारतीय
टकसालों तथा रिजर्व खजानों से प्राप्त कर सके।
- कि इस प्रकार प्राप्त सोना कागजी मुद्रा निधि का भाग होना चाहिए और उसे या
तो ब्रिटेन की पूर्ण वैध मुद्रा स्वर्ण के सिक्कों के रूप में या सोने की सिल्ली/छड़
के रूप में रखना चाहिए। उनमें से प्रत्येक सिल्ली 1,000 रुपये से कम न हो।
- कि रुपये की मुद्रा को संकुचन की स्वचालित शक्ति प्रदान करने के लिए सरकार
को चाहिए कि जैसे ही कागजी मुद्रा निधि (रिजर्व) का एक भाग लगातार एक
वर्ष तक उस राशि से कम रहे जो सोने में रखी थी, तो तत्काल रुपये के बदले
सोना दें, या रुपये के नोट 1 शि. 4 पें. (1 एस 4 डी) की दर से दे यदि उन्हें
10,000 रुपये की राशि में उसके लिए प्रस्तुत किया जाए। देने की यह शक्ति
यद्यपि अपेक्षित न भी हो सरकार को यह शक्ति प्रदान की जानी चाहिए।
- प्रचलन में दस हजार रुपये के नोटों को वापस ले लेना चाहिए और भविष्य में
धारक की इच्छा पर या तो सोने या चांदी के रुपये में देय दस हजार रुपये के
नोटों को केवल अकेले सोने के बदले में जारी किया जाना चाहिए चूंकि सिल्लियों
व छड़ों के रूप में सोना विशेष रूप से किसी ऐसे बकाया नोटों को चुकाने के
लिए आरक्षित रखा जाता है।
- उसकी भारतीय सिक्के तथा मुद्रा, इफिंघम विल्सन, लंदन 1897 पासिम, विशेषतः पृष्ठ 121 इकोनोमिक
जर्नल, खंड 7, पृष्ठ 574-75 में लिंडसे द्वारा सारांश भी।