स्वर्ण मानक की ओर
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‘‘50. इस योजना (श्री प्रोबीन की) पर हमारी यह टिप्पणी कि बुलियन को विनिमय का अंतर्राष्ट्रीय माध्यम माना जाए, परंतु ऐसी कोई नजीर या पूर्वोदाहरण नहीं है जिसमें इसे आंतरिक मुद्रा के लिए स्थायी रूप में अपनाया गया हो और न यह यूरोपीय या भारतीय उपयोग से मेल खाती है कि मानक धातु को चालू सिक्के के सुविधाजनक रूप में एक हाथ से दूसरे हाथ में नहीं गुजरना चाहिए। ऐसी योजना के लिए ‘‘पील के अधिनियम, 1819 के बिल्कुल अस्थायी प्रावधान से कोई वास्तविक समर्थन प्राप्त नहीं होता है, जिससे बैंक ऑफ इंग्लैंड को नकद रोकड़ भुगतान के कार्य को पुनः आरंभ करने के लिए प्रथम कदम के रूप में एक सीमित अवधि के लिए, मोहर चिर्तिं स्वर्ण की छड़ों, उसके नोटों का उस समय भुगतान करने के लिए प्राधिकृत किया गया जब उन्हें 200 पाउंड से अधिक के पार्सलों में प्रस्तुत किया गया था। ऐसा प्रतीत होता है कि सोने के बुलियन के लिए 1821 में बैंक से कोई मांग नहीं की गई।
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‘‘53. यह बात स्पष्ट है कि वे तर्क जो श्री प्रोबीन की बुलियन स्कीम को स्थायी रूप में अपनाने के विरुद्ध और भारत के लिए स्वर्ण मुद्रा के पक्ष में दिए जाते हैं वे श्री लिंडसे की चतुर योजना, जिसे विनिमय मानक की संज्ञा दी गई, के विरुद्ध और अधिक दृढ़ता से बताते हैं। हम लार्ड रोथ शील्ड, सर जॉन लुबक, सर सेमुअल मोंटेगु तथा अन्य व्यक्तियों के साक्ष्यों से प्रभावित हुए हैं कि एक दिखाई देने वाली स्वर्ण मुद्रा के बिना किसी भी प्रणाली को अविश्वास के साथ देखा जाएगा। इस मत की अभिव्यक्ति के सामने इस निष्कर्ष को टालना कठिन है कि लिंडसे की योजना को अपनाने से भारत में पूंजी का वह प्रवाह रुक जाएगा जिस पर भारत का आर्थिक भविष्य बहुत अधिक निर्भर है। हम श्री लिंडसे की स्कीम की सिफारिश करने के लिए तैयार नहीं हैं अथवा एक स्थायी व्यवस्था के रूप में अपनाने के लिए स्व. श्री राफेल तथा मेजर डारविन द्वारा प्रस्तावित समानार्थक योजनाओं की भी सिफारिश नहीं कर सकते, और वर्तमान परिस्थितियों में पाउंड विनिमय को निर्धारित करने के लिए अस्थायी उपाय के रूप में इनमें से किसी भी योजना को अपनाने की आवश्यकता नहीं है।’’
समिति ने भारत सरकार की योजना को तरजीह दी और उसे स्थायी आधार प्रदान करने के लिए अपनाए जाने वाले कार्रवाई के तरीके की रूपरेखा प्रस्तुत की। इसे नीचे समिति की ही अपनी भाषा में उद्घृत किया जाता हैःµ
‘‘54. हम ब्रिटिश सॉवरेन को भारत में एक वैध मुद्रा तथा चालू सिक्का बनाने के पक्ष में हैं। हमारा यह भी विचार है कि साथ ही साथ भारतीय टकसालों के द्वार सोने के प्रतिबंधित सिक्का निर्माण के लिए खोल देने चाहिए। ऐसा उन शर्तों पर किया जाए जो रॉयल टकसाल की तीन आस्ट्रेलियाई शाखाओं पर लागू होती हैं। इसका परिणाम यह होगा कि समान परिस्थितियों में, सॉवरेन के सिक्के बनाए जाएंगे और