166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उनका चलन ब्रिटेन में तथा भारत में होगा। जो सोने के मुक्त अंतर्वाह तथा बहिर्वाह के सिद्धांत पर आधारित स्वर्णमान तथा मुद्रा की भारत में प्रभावी स्थापना की उत्सुकता से प्रतीक्षा करते हुए हम इन उपायों को अपनाने की सिफारिश करते हैं।’’
इन सिफारिशों को सेक्रेटरी ऑफ स्टेट द्वारा स्वीकार कर लिया गया था ख्1, जिसने यह निर्णय किया था किµ
‘‘भारतीय टकसालों को चांदी के अप्रतिबंधित सिक्का निर्माण के लिए बंद रखने की नीति को ज्यों का त्यों रखा जाएगा।’’ और भारत सरकार से यह कहा जाएगा कि वह जितना जल्दी उचित समझे उतना जल्दी ब्रिटिश सॉवरेन को वैध मुद्रा तथा एक चालू सिक्का बनाने के लिए आवश्यक कार्रवाई करें और समिति द्वारा सुझाई गई शर्तों के अनुसार सोने के सिक्के बनाने के लिए तैयारी करें।’’
समिति की प्रथम सिफारिश को सरकार ने एक अधिनियम पारित करके लागू किया। उस अधिनियम का सामान्य नाम ‘‘भारतीय सिक्का तथा कागज मुद्रा अधिनियम (इंडियन कॉयनेज एंड पेपर करेंसी एक्ट (22) 1899) था। उस अधिनियम ने सॉवरेन तथा अर्धसॉवरेन को क्रमशः 15 रुपये तथा 7 ½ रुपये की दर पर वैध मुद्रा बना दिया और उनके बदले मुद्रा के नोटों के निर्गम को प्राधिकृत कर दिया।
भारतीय मुद्रा को स्वर्ण आधार पर रखने के साथ-साथ सरकार सोने के सिक्कों के मुक्त निर्माण के लिए एक टकसाल खोलने के लिए भी उत्सुक थी। परन्तु टकसाल से जारी किया जाने वाला सिक्का ‘‘इंगलिश सॉवरेन’’ था, अतः भारत सरकार पूर्णतया ब्रिटिश ट्रेजरी के हाथ में थी। ‘‘इंगलिश कॉयनेज एक्ट, 1870 के प्रावधानों के अनुसार एक घोषणा जारी करना आवश्यक था जिसके अनुसार एक भारतीय टकसाल को रॉयल टकसाल की शाखा बनाना था यह विषय ट्रेजरी की सहमति पर पूर्णतया निर्भर था, भारत सरकार का यह इरादा था कि वह सॉवरेन को वैध मुद्रा बनाने वाले अधिनियम को पारित करने के साथ ही साथ घोषणा भी जारी कर दे। वास्तव में उसने घोषणा के आने तक विधि निर्माण के कार्य को भी रोक लिया ख्2, बड़े अनमने ढंग से उस समय कार्रवाई आरंभ की जब यह परामर्श दिया गया कि कानूनी तथा तकनीकी प्रश्नों के कारण घोषणा में कुछ और विलम्ब होने की संभावना है।’’ ट्रेजरी द्वारा की गई आपत्तियां यद्यपि केवल तकनीकी आपत्तियां थीं, परंतु वे पहले तो बिल्कुल अलंध्य व दुस्तर प्रतीत हुई ख्3, और यदि भारत कार्यालय (इंडिया ऑफिस) का दृष्टिकोण समझौता मैत्रीपूर्ण न होता तो (संधि) वार्ता टूट गई होती। परंतु ट्रेजरी इस परियोजना को अवसरु प्रदान करने की इच्छुक नहीं थी। जब इस प्रश्न के तकनीकी पहलू पर समझौता हुआ तो ट्रेजरी ने रुख बदला और एक प्रश्न उठाया कि क्या सोने
- देखें 25 जुलाई 1899 का प्रेषण संख्या 140 (वित्तीय) 1899 का सी 9421
- इंडियन कॉयनेज तथा पेपर करेंसी बिल पर दिनांक 8 दिसम्बर, 1899 को माननीय श्री डॉकिन्स का
भाषण
- एच आफ सी रिटर्न 495ए 1913 पृष्ठ 14.