4. स्वर्ण मानक की ओर - Page 183

168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है, उससे विश्वास और भी अधिक हो जाता है।..... कि ट्रेजरी ने समूचे प्रस्ताव के प्रति शायद अप्रत्यक्ष शत्रुता की भावना से काम किया ‘‘यह बात सुस्पष्ट है। परंतु इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ट्रेजरी ने पूर्णतया ठोस व युक्तियुक्त तर्क प्रस्तुत किए। यह बात स्वर्णमान की कार्यशैली के लिए महत्वहीन थी कि सिक्कावाला सॉवरेन कहां से आता था। जब तक एक टकसाल सॉवरेन के मुक्त सिक्का निर्माण के लिए खुली रहती, तब तक भारतीय स्वर्णमान पूर्ण हो जाता, टकसाल का स्थान चाहे जहां होता। वास्तव में सिक्का वाली सॉवरेन को लंदन से प्राप्त करना केवल पर्याप्त ही नहीं होता बल्कि वह कम खर्चीला भी होता।

तथापि सरकार ने जो चिंता व्यक्त की थी वह सोने की टकसाल के अभाव के कारण नहीं थी। वास्तव में उसका विश्वास उसकी आवश्यकता के प्रति इतना कम था कि ट्रेजरी के विरोध को दृष्टि में रखते हुए उसने शालीनता से इस प्रस्ताव को छोड़ना स्वीकार कर लिया। उसको सबसे अधिक परेशानी नई मुद्रा प्रणाली में रुपये की विलक्षण स्थिति से हुई। भारत सरकार को अपने विज्ञप्ति में उसे यही खेद रहा कि उसे रुपये को अवमुद्रित करने का तरीका नहीं दिखाई दे सका और भारतीय मुद्रा का उस प्रकार र्स्वागीकरण तरीका नहीं देख सकी जो इंगलैंड में प्रचलित था। विज्ञप्ति का सामान्य अवलोकन करने पर यह पता चलता है कि यद्यपि उसने भारतीय मुद्रा के फ्रांस तथा संयुक्त राज्य अमेरिका की मुद्रा अपनाने की सिफारिश की थी परन्तु उसने ऐसा इस कारण नहीं किया था कि उसने यह सोचा था कि उनकी प्रणाली सर्वोत्तम व आदर्श प्रणाली है बल्कि इसका कारण यह था कि उसका विश्वास था कि इससे बेहतर प्रणाली तक उसकी पहुंच नहीं है। फ्रांस तथा संयुक्त राज्य अमेरिका की मुद्रा प्रणाली के स्वीकृत दृष्टिकोण के प्रति सम्मान के कारण यह स्वाभाविक था कि भारत सरकार ने स्वयं को इसके प्रति बहुत उल्लासित महसूस नहीं किया। इन दो देशों की मुद्रा प्रणाली की दृष्टि से पांच फ्रैंक के सिक्के तथा चांदी के डालर की स्थिति को हमेशा इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है जैसे कि ये एक-दूसरे के बहुत ही सदृश हैं। प्रो. पियरसन जैसा महान विद्वान भी उनको, मुद्रा के विभिन्न रूपों के वर्गीकरण करने की परम्परागत योजना में सुबोधगम्य स्थान प्रदान करने में असफल रहा। ख्1, परम्परागत स्वर्णमान सुव्यवस्थित प्रणाली में स्वर्ण ही एकमात्र ऐसी धातु है जिसके सिक्के मुक्त रूप में बनाए जाते हैं और केवल यही एकमात्र ऐसी धातु है जिसमें पूर्ण वैध मुद्रा की शक्ति है, यद्यपि चांदी के भी सिक्के बनाए जाते रहे, परंतु उसके सिक्के सीमित मात्रा में सरकारी लेखे पर बनाए जाते हैं और चूंकि इसका आंतरिक मूल्य उसके अंकित मूल्य की अपेक्षा कम होता है, अतः यह एक सीमित वैध मुद्रा होती है। पहली प्रकार के सिक्कों को मानक सिक्के कहते हैं और बाद वाले प्रकार के सिक्कों को सहायक सिक्के कहा जाता है और दोनों मिलकर एक धातुक स्वर्णमान का आदर्श प्रस्तुत करते हैं जैसा कि इंग्लैंड में 1816 से स्थापित है। ऐसी स्थिति में लेखकों को डालर या

  1. प्रिंसिपल्स ऑफ इकोनोमिक्स खंड 1, पृष्ठ 569