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स्वर्ण मानक की ओर

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पांच फ्रैंक के सिक्कों को उपयुक्त ठहराने में कठिनाई हुई है। उनकी विशेषता इस तथ्य में निहित है कि यद्यपि उनका आंतरिक मूल्य, उनके अंकित व नामित मूल्य की अपेक्षा कम होता है फिर भी वे अविनिमेय तथा असीमित वैध मुद्रा रहे हैं। इस असंगति के कारण ही थोड़े से स्वर्णमान के अधिकार को अमरीकी तथा फ्रांसीसी मुद्रा प्रणाली के लिए अस्वीकृत कर दिया गया है अर्थात् इन मुद्राओं को स्वर्ण का हक नहीं दिया गया है। शिथिल व लचीले मानक ख्1, में बहुत कम लोगों का विश्वास हो सकता है। ऐसे मानक के संबंध में यह कहा जाता है कि किसी प्रकार चांदी के सिक्के का आंतरिक मूल्य यद्यपि सोने की अपेक्षा कम होता है और वह लड़खड़ाता है पर फिर भी उसे समानता पर बनाए रखा जाता है। ऐसा उसको उसके अपेक्षाकृत और अधिक प्रबल सहयोगी के साथ संयोजित करके (मिलाकर) किया जाता है। ख्2,

परंतु क्या फ्रांसीसी मुद्रा प्रणाली इंगलिश मुद्रा प्रणाली से इतनी अधिक अलग थी कि उससे उसकी स्थिरता के संबंध में संदेह उत्पन्न हो जाए? इन दोनों प्रणालियों के बीच चाहे जो अंतर रहा हो, इनका निकट विश्लेषण करने से पता चलता है कि वे मूल रूप में एक समान हैं। यदि एक ओर हम 1803 के फ्रांसीसी द्विधातुक कानून तथा 1878 की टकसाल स्थगन आदेश (मिंट सस्पेंश्न डिक्री ऑफ 1878) और दूसरी ओर 1844 के बैंक चार्टर एक्ट के साथ-साथ 1816 के इंगलिश गोल्ड स्टैंडर्ड एक्ट के प्रावधानों का एक साथ अध्ययन करें और उनकी तुलना करें तो क्या हमें फ्रांसीसी तथा ब्रिटिश मुद्रा प्रणाली के बीच कोई बड़ा अंतर मिलता है? 1878 से पहले फ्रांस में सोना तथा चांदी दोनों के सिक्कों के असीमित वैध मुद्रा होने का एक असीमित था। सन् 1844 से पहले इंग्लैंड में इन दोनों अर्थात् सोने के सॉवरेन तथा बैंक ऑफ इंग्लैंड के नोटों दोनों के असीमित वैध मुद्रा होने का असीमित था। 1844 में इंग्लैंड बैंक ने नोटों का (निर्गम) सीमित कर दिया परंतु निर्गमों को उनकी वैध मुद्रा की शक्ति से वंचित नहीं किया था। ख्3, 1878 में फ्रांस ने भी अपने नोटों के साथ ठीक-ठीक वैसा ही किया जैसा 1844 में इंग्लैंड ने अपने नोटों के साथ किया था। टकसाल के निलंबन के आदेश द्वारा, फ्रांस ने वास्तव में, यद्यपि अप्रत्यक्ष रूप में ही, पांच फ्रैंक के सिक्कों पर प्रतिबंध लगा दिया। परंतु उनको उनकी वैध मुद्रा की शक्ति से वंचित नहीं किया। यदि हम फ्रांस के पांच फ्रैंक के सिक्कों को चांदी पर मुद्रित नोटों के रूप में मानते हैं तो इस बात को देखना कठिन है कि इन दो प्रणालियों के बीच कौन-सा अंतर है, जिसके कारण अर्थशास्त्री एक को स्वर्णमान तथा दूसरे को लड़खड़ाने वाला मान कहते हैं। यदि चांदी की फ्रैंक लंगड़ाती है और साथ-साथ लड़खड़ाती है बैंक

  1. ऐसा इस विश्वास की कमी के कारण था जो जर्मनी ने 1 अक्तूबर, 1907 के कानून द्वारा अपने सिल्वर

थे्रलर्स से वैध मुद्रा की पूर्ण शक्ति ले ली। संयुक्त राज्य में चांदी के डालर को संविदा की शर्तों द्वारा

विशेष रूप से बाहर निकाल दिया जाए तो वह वैध मुद्रा नहीं रहता। ए सी व्हिटाकर, विदेशी विनिमय

(फॉरेन एक्सचेंज) एपिल्टन, न्यूयार्क 1920 पृ. 8 तथा 277

  1. सी.एफ.डब्ल्यू टासिंग, प्रिंसिपल्स द्वितीय संस्करण, 1918 पृ.280

  2. बैंक ऑफ इंग्लैंड के नोटों को लॉर्ड आल्थोर्पस के 1833 के अधिनियम द्वारा वैध मुद्रा बनाया गया था।