4. स्वर्ण मानक की ओर - Page 185

170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

नोट भी उसी प्रकार करता है और फ्रैंक नोट की अपेक्षा बेहतर ढंग से लड़खड़ाता है, क्योंकि इन दोनों में उसका आंतरिक मूल्य इसकी अपेक्षा अधिक होता है। तथापि, यदि यह तर्क दिया जाता है कि बैंक नोट सोने में विनिमेय होता है जबकि पांच फ्रैंक का सिक्का नहीं होता। इसका उत्तर यह है कि तुलना बैंक ऑफ इंग्लैंड के न्यासीय नोटों के साथ की जानी चाहिए। वे नोट वास्तव में अविनिमेय होते हैं। क्योंकि किसी निश्चित समय पर बैंक ऑफ इंग्लैंड सोने के साथ अपने निर्गम विभाग में नोटों के न्यासीय भाग को रखता है तो उसके अंतर्गत नहीं आता और इसलिए उसे उतना ही अविनमेय माना जा सकता है जितना पांच फ्रैंक का अप्रतिबंधित निर्गम होता है। पंरतु यदि इस बात पर जोर दिया जाए कि न्यासीय नोटों को उस प्रकार से अविनिमेय नहीं माना जा सकता जिस प्रकार पांच फ्रैंक के सिक्के होते हैं। यह बात बता देनी चाहिए कि इन दोनों में समानता का निर्धारण विनिमेयता अथवा अविनिमेयता के विचार से नहीं किया जाता है। अविनिमेयता का लक्षण जिससे बैंक ऑफ इंग्लैंड के न्यासीय नोट संपन्न किए जाते हैं एक अनावश्यक लक्षण हैं जो पांच फ्रैंक के सिक्कों की तुलना में उनकी स्थिति में वृद्धि नहीं करता। उन दोनों में समानता इस तथ्य के कारण है कि उन दोनों का निर्गम एक निश्चित सीमा के अंतर्गत होता है। इस दृष्टि से, फ्रांसीसी लड़खड़ाता मानक तथा इंगलिश स्वर्णमान और कुछ नहीं बल्कि ‘‘उस सीमा तक मुद्रा सिद्धांत’’ के विभिन्न उदाहरण हैं, जहां तक कि एक न्यासीय मुद्रा पर निर्गम की निर्धारित सीमा, उस सिद्धांत का एक मूल है।

फ्रांस की मुद्रा प्रणाली का संगठन ही केवल इंगलिश मुद्रा प्रणाली के समान है, बल्कि दोनों की अभिकल्प बनावट व ढांचा भी एक समान है। जो विवाद बैंक चार्टर एक्ट, 1844 के संबंध में उत्पन्न हुआ था, उसमें लार्ड ओवरस्टोन के अभिप्राय, बैंकिंग विचारधारा के उसके विरोधियों ने ठीक-ठीक व बिल्कुल स्पष्ट रूप में पूर्णतया समझा नहीं था। लॉर्ड ओवरस्टोन की नोटों के प्रचलन के अवमूल्यन को रोकने के तरीके प्रदान करने में कोई रुचि नहीं थी, जैसा कि उसके विरोधी उसके संबंध में ऐसा सोचते थे। उसका सर्वोपरि ध्यान सोने को प्रचलन से लुप्त होने से रोकने का था। ऐसे तर्क की एक शृंखला से आरंभ करके, जिनकी प्रामाणिकता व दृढ़ता के संबंध में कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता, वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि नोटों के निर्गम में वृद्धि से सोने का प्रचलन बंद हो जाएगा। सोने के प्रचलन में रखने का केवल एकमात्र उपाय नोटों के निर्गम पर प्रतिबंध लगाना था और 1844 के बैंक चार्टर एक्ट का यही उद्देश्य था। चांदी के सिक्कों का निर्माण स्थगन करने में फ्रांस का भी हुबहू वही उद्देश्य था। जैसा कि पहले कहा जा चुका है। 1873 के बाद चांदी के मूल्य में गिरावट के कारण इस अवमूल्यित धातु के प्रतिस्थापन द्वारा सोना तेजी से प्रचलन से बाहर हो गया था। इसके कारण अनुपात बढ़ जाने की स्थिति