स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक
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और दूसरा रुपये का जो पूरे का पूरा भारत सरकार के पास भारत में रहता है किंतु वर्तमान प्रणाली और मि. लिंडसे की प्रणाली इन कोषों के रखरखाव और स्थान के बारे में ही नहीं है। दोनों कोषों के परिचालन के बारे में भी यह समानता है। जैसा कि मि. लिंडसे ने सुझाया था, जब भारत में रुपयों की आवश्यकता होती है तब भारत सचिव ‘‘कौंसिल बिल’’ बेच देता है जिनके बदले भारत के सरकारी खजानों से रुपये लिए जा सकते हैं। इस तरह भारत में रुपया मुद्रा की व्यवस्था हो जाती है। जब भारत सरकार को स्वर्ण की आवश्यकता पड़ती है, वह ‘‘रिवर्स कौंसिल’’ लंदन की होम ट्रेजरी को बेच देती है और इस तरह विदेशी भुगतान के लिए स्वर्ण की व्यवस्था हो जाती है। ‘‘कौंसिल बिलों’’ और ‘‘रिवर्स कौंसिल’’ की इन दोनों कोषों के बिलों का नतीजा यह निकलता है जैसा कि फाउलर कमेटी ने चाहा था कि भारतीय मुद्रा को स्वर्ण प्रतिमान वाली स्वर्ण मुद्रा बना दिया जाए, उसे बदल कर मि. लिंडसे की इच्छा के अनुसार बिना स्वर्ण मुद्रा के स्वर्ण प्रतिमान वाली मुद्रा बना दिया गया है।
जैसा कि भारत सरकार ने मूल रूप में कल्पना की थी, उसकी जगह जो प्रणाली विकसित हो गई है, वह स्वर्ण विनिमय प्रतिमान है। इस शीर्षक का जो कुछ भी तात्पर्य निकले परंतु यह वह प्रणाली नहीं है जिसकी 1898 में भारत सरकार ने कल्पना की थी। यह फेर-बदल कैसे हुआ इसकी चर्चा हम अन्यत्र करेंगे यहां पर यह कह देना काफी है या यों कहिए कि अनिवार्य है, क्योंकि कई लेखक इस मुद्दे पर आकर गलती कर गए हैं कि भारत सरकार ने स्वर्ण विनिमय प्रतिमान स्थापित करने के लिए शुरुआत नहीं की थी। वास्तव में परिकल्पना तो यह थी कि एक वास्तविक और शुद्ध स्वर्ण प्रतिमान कायम किया जाएगा यद्यपि इसे तैयार करने वाली भी पर्याप्त रूप से नहीं समझे थे पर असल में यह 1844 के इंगलिश बैंक चार्टर एक्ट के सिद्धांतों के अनुरूप बन गया था।
अब इस नई प्रणाली के बारे में हम क्या कहें? चैम्बरलेन कमीशन ने इसके बारे में रिपोर्ट देते हुए कहा था कि इसे आदर्श स्वर्ण मुद्रा वाले स्वर्ण मानक से तो हटा दिया गया है और साथ ही इसमें यह भी टिप्पणी की गई ख्1, -
‘‘पर इस प्रत्यन्तर का उल्लेख करने का यह मतलब नहीं कि हम की गई
कार्रवाई की या वास्तविक प्रचलित प्रणाली की निंदा करते हैं.....’’
अब ऐसा क्यों नहीं किया गया? क्या यह वही प्रणाली नहीं है जिसका प्रस्ताव भारत सरकार ने 1878 में किया था और 1879 में समिति ने जिसकी निंदा की थी।
- रिपोर्ट पैरा 46