5. स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक - Page 191

176 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

यह सच है कि समिति ने 1879 में इस योजना के विरुद्ध जो तर्क दिए थे उनमें बहुत वजन नहीं था। ख्1, तथापि यह योजना निश्चय ही मजबूत नहीं थी। स्वर्ण मानक जारी करने के पक्ष में मुख्य मुद्दा यह था कि रुपयों की मात्रा की सीमा रखी जाए। इसी दृष्टि से हमें इस योजना पर विचार करना चाहिए। परन्तु 1878 की योजना में ऐसा कुछ नहीं जिस पर इस उद्देश्य की पूर्ति की दिशा से विचार किया गया हो। रुपयों की मात्रा पर कोई सीमा लगाने की जगह योजना में तो जानबूझ कर टकसालों को यह छूट दी गई थी कि वे चांदी के सिक्के बना लें। इस योजना की एक रोचक बात यह थी कि इसमें मालिकाना प्रणाली की व्यवस्था इस तरह की गई थी कि रुपयों की मूल्यवान धातु का मूल्य इसे दिए गए स्वर्ण मूल्य के बराबर हो। परंतु रुपयों के सिक्के ढालने की एक सीमा रखने की दृष्टि से यह बेकार की बात थी। केवल मालिकाना हक लगा देने से। यह जरूरी नहीं कि सभी परिस्थितियों में इससे रुपये के सिक्के बनाने की एक सीमा तय हो जाएगी। सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि स्वर्ण के रूप में चांदी के टकसाली और बाजार मूल्य के अंतर से मालिकाना हक कितना अधिक मिलता है। यदि मालिकाना हम इस अंतर से कम है तो इससे रुपये के सिक्के ढालने को तब तक के लिए प्रोत्साहन मिलेगा जब तक कि उन पर बट्टा न मिलने लगे। इस दृष्टि से उस योजना में 1816 के इंगलिश गोल्ड स्टैंडर्ड एक्ट को और भी खराब ढंग से लागू किया गया है। भारत सरकार की 1878 की योजना की तरह, यह एक्ट भी दिखाता तो यह था कि स्वर्ण प्रतिमान लागू करना चाहता है पर उसने बंद की गई टकसाल को पुनः खोलने को प्राधिकृत कर दिया था कि मालिकाना प्रभार लाभ कर वह चांदी के सिक्के खुले रूप में ढालने शुरू कर दे। यह बात आमतौर पर नहीं समझी जाती कि इस एक्ट की खुले रूप से चांदी के सिक्के ढालने की धाराएं कितनी मूर्खतापूर्ण थीं ख्2, जिसे एक धातु के रूढि़वादी पक्ष पर आदर्श मानते हैं? परंतु इंग्लैंड का यह सौभाग्य था कि मिंट मास्टर (टकसाल के मुख्य अधिकारी) को विवश करने वाली वह घोषणा कभी जारी ही नहीं की गई कि जो भी चांदी टकसाल में लाई जाए उसके सिक्के बना दिए जाएं। अन्यथा स्वर्ण प्रतिमान का चलना ही बहुत काफी संकट में पड़ जाता। ख्3, 1816 के अधिनियम में कम से कम एक सावधानी बरती गई थी और वह यह थी कि वैध मुद्रा के रूप में चांदी की एक सीमा निर्धारित कर दी गई थी। भारत सरकार की योजना में न केवल

  1. देखें उल्लिखित अध्याय IV

  2. तथापि आर.जी.हॉट्रे कृत ‘‘करेंसी एंड क्रेडिट’’ भी देखें । 1919 पृष्ठ 302-3

  3. 1819 में नियुक्त नकद अदायगी की लार्ड्स कमेटी के समक्ष कुछ गवाहों ने 1816 के चांदी संबंधी

अधिनियम की धारा के बारे में कुछ संदेह प्रकट किए थे कि क्या नकद अदायगी की व्यवस्था इंग्लैंड

में स्वर्ण प्रतिमान स्थापित करने का एक उपयुक्त साधन है। देखें विशेष रूप से कमेटी के समक्ष दी

गई मि. फलेचर तथा मि.मुशेट की गवाही।