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स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक

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चांदी के सिक्के खुले तौर पर बनाने की अनुमति दी गई बल्कि उसे पूर्ण वैध मुद्रा का दर्जा भी दिया गया। इस तरह जहां तक इस योजना में रुपयों की मांग पर नियंत्रण की व्यवस्था नहीं है, यह उस स्वर्ण प्रतिमान को नष्ट करने वाला भी है जिसे दृष्टि में रखकर यह व्यवस्था की गई है।

1878 की योजना और वर्तमान प्रणाली में अंतर केवल इतना ही है कि पिछली योजना में टकसालें जनता के लिए भी खुली थीं जबकि वर्तमान प्रणाली में वे केवल सरकार के लिए खुली हैं। दूसरे शब्दों में एक मामले में चांदी के सिक्के जनता के लिए बनाए जाते थे जबकि दूसरे मामले में वे सिक्के सरकार के लिए बनाए जाते हैं। यहां यह बात नहीं है कि 1878 में सरकार ने यह सोचा ही नहीं था कि टकसालें जनता के लिए बंद कर दी जाएं। बल्कि सरकार ने रुपये के सिक्के सरकार द्वारा बनवाने की संभावना पर विचार किया था पर उसे कुछ ठोस कारणों से रद्द कर दिया था। तत्कालीन सरकार ने इस योजना की रूपरेखा के बारे में भेजी गई विज्ञप्ति में कहा थाः µ

‘‘48. प्रस्तावित परिवर्त लाने के लिए जो पहली सावधानी बरती जानी चाहिए वह यह है कि मुद्रा के प्रसार की पूरी छूट होनी चाहिए, यदि यह देश की व्यापारिक आवश्यकताओं की मांग हो। हमारे विचार में यदि टकसालें जनता के लिए (चांदी के सिक्के ढालने के लिए) पूरी तरह बंद कर दी जाएं, तो ऐसा नहीं हो सकता। यदि यह कदम उठाया गया तो चांदी की मांग पूरी करने की जिम्मेदारी सरकार पर आ पड़ेगी और आज बाजार में सोने और चांदी की मांग की जो स्थिति है उसे देखते हुए सरकार के लिए यह जिम्मेदारी उठाना संभव नहीं होगा।’’

‘‘49. स्वर्ण प्रतिमान के साथ चांदी की भारतीय मुद्रा के विस्तार के लिए जो सबसे सरल उपाय लगता है और इसलिए उसे सर्वोत्तम उपाय कहा जा सकता है, वह यह है कि जो भी व्यक्ति सरकार से स्वर्ण मुद्रा के बदले चांदी की मुद्रा मांगे वह नई प्रणाली में निश्चित दर निर्धारित कर दें। दो और टकसालों को स्वर्ण मुद्रा बनाने के लिए खोल दें और चांदी की मुद्रा बनाने के लिए बंद कर दें। परन्तु चूंकि भारत में चांदी की पूर्ति इतनी नहीं है कि सिक्के बनाने के लिए आवश्यक मात्रा में मिल सके, इसलिए सरकार यह जिम्मेदारी नहीं उठा सकती क्योंकि ऐसा करने के लिए सरकार को चांदी खरीदने और उसका भंडार रखने की जटिल प्रक्रिया में से गुजरना पड़ेगा और यह करना समीचीन नहीं होगा।’’

इन कारणों से यद्यपि हम प्रत्यक्ष रूप में सम्बद्ध नहीं हैं, तथापि हाल में ‘‘इंडिया आफिस ने चांदी की खरीद में जो घोटाला किया है, उसे देखते हुए तो ये देववाणी

  1. देखें 1912 का पृष्ठ 400