5. स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक - Page 193

178 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

तुल्य प्रतीत होते हैं। ख्1, महत्वपूर्ण बात तो यह देखना है कि क्या मुद्रा जारी करने के तरीके से रुपये के सिक्कों की मात्रा पर प्रभावकारी ढंग से सीमा लगाने पर कोई अंतर पड़ता है। अब इस बारे में काफी भ्रम है कि व्यक्तियों द्वारा सिक्के बनवाने के लिए टकसालों को बंद करने का क्या विशेष लाभ हुआ। आमतौर पर यह विश्वास किया जाता था कि जनता के लिए टकसालें बंद कर देने से सरकार को रुपये जारी करने का एकाधिकार मिल जाएगा और यह एकाधिकार मिल जाने से रुपये का स्वर्ण मूल्य स्थिर बना रहेगा क्योंकि अधिक रुपये जारी करने पर रोक लगाई जा सकेगी। यह तो स्वीकार करना ही पड़ेगा कि जनता के लिए टकसालें बंद कर देने से सरकार को एकाधिकार मिल गया है। परंतु एकाधिकार मिल जाने से रुपये की मुद्रा अधिक मात्रा में जारी करने पर रोकथाम लग जाएगी, यह बात आसानी से समझ में नहीं आती। जनता को मुक्त रूप से रुपये बनवाने के लिए टकसालों को बंद कर देना ऐसा ही है जैसा बैंकों को नोट जारी करने की छूट न दी जाए और यह एकाधिकार किसी सैंट्रल बैंक को दे दिया जाये। परंतु यह तर्क कभी किसी ने नहीं दिया कि क्योंकि सैंट्रल बैंक का एकाधिकार होगा, इसलिए वह जरूरत से ज्यादा नोट जारी नहीं कर सकता। इसी तरह चूंकि भारत सरकार के पास एकाधिकार है, इसलिए यह तर्क बेवकूफी होगी कि वह जरूरत से ज्यादा मुद्रा जारी नहीं कर सकती। वास्तव में एक एकाधिकारवादी भी अधिक नहीं तो उतनी ज्यादा मात्रा में तो मुद्रा जारी कर ही सकता है जितनी जनता के सब लोग मिल कर करते। सिक्के ढालने में लाभ की दृष्टि से तो वर्तमान योजना 1878 की योजना से कहीं घटिया है। यह सच है कि दोनों ही मामलों में लाभ की मात्रा ढाले गए सिक्कों की मात्रा पर निर्भर करेगी। परंतु पहले मामले में लाभ के कारण सिक्के ढालने को कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता थाµ न तो सरकार को, क्योंकि उसके पास सिक्के बनाने की शक्ति नहीं थी और न ही लोगों को जो सिक्के ढालने की मात्रा निर्धारित करते थे क्योंकि व्यावहारिक रूप से मालिकाना नियंत्रण से टकसाल में सिक्के ढालने के लिए फालतू धातु लाना कोई लाभकारी नहीं रहता था। परंतु वर्तमान मामले में चूंकि सिक्के ढालने का पूरा काम सरकार के हाथों में होगा, इसलिए लाभ कमाने के लिए (मुद्रा को मजबूत बनाने के नाम पर) सरकार जरूरत से ज्यादा सिक्के ढलवा लेगी और विशेषकर इस दशा में यदि चांदी की कीमतें बहुत ही घट गईं और रुपये की टकसालो कीमत और बाजार की कीमत में बहुत अंतर आ गया। ख्1,

  1. इस दृष्टि से प्रो. केन्स का यह प्रस्ताव वर्तमान मुद्रा प्रणाली के लिए अपेक्षाकृत असुरक्षित लगता है कि

चांदी की लागत चाहे कुछ भी न हो, रुपये का स्वर्ण मूल्य निर्धारित कर दिया जाए। देखें 1919 के

इंडियन करेंसी कमीशन के आगे प्रो. केन्स की गवाही, प्रश्न 2680