5. स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक - Page 194

स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक

179

यदि यह तर्क दिया जाए और हो सकता है कि दिया भी जाए कि एक एकाधिकारी के नाते सरकार की इच्छा यह होगी कि मुद्रा का मूल्य ”ास न हो जाए और इसलिए हो सकता है कि वह जरूरत से अधिक रुपये जारी नहीं करे बजाय उस समय के जब सिक्के ढालने का काम जनता या लोगों के हाथ में हो। अतः इस बात का उत्तर यह है कि सरकार इस सीमा को प्रभावकारी तभी बना सकती है जब उसके पास सिक्के जारी करने से मना करने की शक्ति हो। जहां तक इच्छा का सवाल है केन्द्रीय बैंक अपनी मुद्राओं की सीमा बांध सकते हैं क्योंकि उनका किसी व्यक्ति को मुद्रा जारी करने अथवा न करने का कोई दायित्व नही होता है। परन्तु इस बारे में भारत सरकार की स्थिति तो दयनीय रूप से दुर्बल होती है। जब भी कोई मांग करे, उसे मुद्रा जारी करनी ही पड़ेगी। यह सच है कि हर बार मुद्रा जारी करने का यह अर्थ नहीं होता कि प्रचलन की मुद्रा में वृद्धि हो जाएगी, क्योंकि नई जारी की गई मुद्रा का एक अर्थ तो वह होगा जो सरकार के पास वापस लौट आई होगी। बहरहाल यह नहीं कहा जा सकता कि अपने एकाधिकार के बूते पर सरकार मुद्रा की मात्रा की कारगर सीमा बांध सकती है इसके विपरीत सरकार के पास मुद्रा जारी करने से बचने का कोई उपाय ही नहीं है, वास्तव में इस अधिकार ने सरकार को जकड़ लिया है और उनकी स्थिति मजबूत बनाने की जगह काफी कमजोर कर दी है। ख्1, इस बारे में चैम्बरलेन कमीशन का विचार था ख्2, -

‘‘यद्यपि सरकार विनिमय बाजार की बहुत बड़ी व्यापारी है तथापि वह एकाधिकारवादी नहीं है (!) और यह संदेहास्पद है कि क्या वह किसी ऐसी चीज (न्यूनतम निर्धारित दर) पर वर्ष भर टिकी रह पाएगी।’’

कमीशन का यह विचार इस दृष्टिकोण से रोचक है कि इसमें यह (दोष) मान लिया गया है कि टकसाल बंद करने का यह लाभ नहीं होगा कि रुपये की मुद्रा की मात्रा की सीमा निर्धारित कर दी जाए जिससे सरकार हमेशा रुपये की कीमत निर्धारित करती रहेगी जिसे वह स्वयं ही बना सकती है।

इस तरह वर्तमान प्रतिमान 1878 के प्रस्तावित प्रतिमान से केवल नाम की दृष्टि से भिन्न है। यदि इसकी यह विशेषता बताई जाए कि विनिमय की दर मुद्रा की मात्रा का नियमन करने की सूचक होगी, तो यह बात पिछले प्रतिमान पर भी लागू होती थी। परंतु जैसी कि मि. हॉट्रे ने टिप्पणी ख्3, की है कि रुपये की कीमत बनाए रखने के

  1. रुपये की मुद्रा जारी करने के इस अनिश्चित दायित्व के खतरे को 1919 की स्मिथ करेंसी कमेटी ने

भी स्वीकार किया था और सिफारिश की थी कि यह दायित्व वापस ले लिया जाए। तथापि इसके पीछे

कमेटी का उद्देश्य और ही था।

  1. रिपोर्ट पैरा 182

  2. ‘करेंसी एंड क्रेडिट’ 1919, पृष्ठ 341