180 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
लिए कुछ भी जोड़-तोड़ कीजिए- ‘‘रुपये का मूल्य प्रचलन में मुद्रा की मात्रा पर निर्भर करेगा।’’ दूसरे शब्दों में स्वर्ण प्रतिमान की सुरक्षा के लिए यह जरूरी है कि रुपया जारी करने के विरुद्ध एक उपबंध है। परंतु जैसा कि हमने देखा है कि न तो 1878 की योजना और न ही वर्तमान योजना इस खतरे से मुक्त है। फलतः हमारा निष्कर्ष यह है कि क्योंकि दोनों एक सी हैं इसलिए पहली के विरुद्ध जो तर्क दिए जाते हैं, वे दूसरी पर भी लागू होते हैं।
परंतु चैम्बरलेन कमीशन यह मानने के लिए तैयार नहीं होगा कि विनिमय प्रतिमान एक मृत प्रायः योजना को पुनः जीवन देने की कोशिश करने के समान है। दूसरी तरफ यह तो मानक में आस्था पैदा करने का प्रयास किया गया है। इसका कथन है कि ख्1,
‘‘वर्तमान भारत में प्रभावी कुछ महान यूरोपीय देशों और अन्य देशों की मुद्रा प्रणालियों से बहुत अधिक मिलती जुलती है। यह देखने के लिए ये मिलती जुलती बातें कौन सी हैं या थीं, हमें मि. केन्स के रोचक शोध प्रबंध ‘इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस’ के दूसरे अध्याय का अवलोकन करना होगा। इस शोध प्रबंध में मि.केन्स ने यह बताने की चेष्टा की है कि भारतीय मुद्रा प्रणाली के परिचालन में और यूरोप के कुछ महत्वपूर्ण देशों के केन्द्रीय बैंकों के परिचालन में मूलभूत साम्यता है। उन्होंने पाया है कि इन बैंकों में यह परिपाटी थी कि विदेशों को प्रेषण करने के उद्देश्य से ये बैंक फारेन बिल्स ऑफ एक्सचेंज को अपने पास रख लेते थे। इन फारेन बिल्स को बेचने और भारत सरकार द्वारा रिवर्स कौंसिल्स को बेचने में उन्होंने एक निकट साम्यता देखी क्योंकि दोनों में हीµ’’
‘‘स्थानीय मुद्रा का उपयोग किया जाता है जो मुख्यतः स्वर्ण की नहीं होती, स्थानीय
मुद्रा के बदले स्वर्ण देने की अनिच्छा रहती है किन्तु एक निश्चित अधिकतम
दर पर स्थानीय मुद्रा में अदायगी के लिए बहुत अधिक इच्छा रहती हैं।’’ ख्2, परंतु
जैसा कि प्रो. केमेरर ने बताया है ख्3, भारत सरकार द्वारा रिवर्स कौंसिल्स बेचने और
विदेशी बैंकों द्वारा फारेन बिल्स को अपने पास रोक रखने में कोई साम्यता देख
पाना कठिन है। कोई साम्यता होने की जगह वास्तव में दोनों प्रणालियां एक दूसरे
की उल्टी हैं। रिवर्स कौंसिल्स बेचते समयµ’’
रिपोर्ट पैरा 46
केन्सः इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस, पृष्ठ 29
‘‘क्वार्टर्ली जर्नल ऑफ इकनॉमिक्स’ फरवरी, 1914 के अंक में केन्स की पुस्तक की समीक्षा